Friday, 10 June 2022

गुम

बहारे कल फिर आयेंगी पर जाने हम कहाँ होंगे,
 ये रास्ते माना चल नहीं सकते, नहीं तो बया करते

 हर उस पल को जो मुझे झंझोड़ सा गया था,
  हर उस सपने को, जिसे तोड़ के मैंने जीना सीखा

 हर उस हवा के झोंके को जिसने मुझे कुछ और दूर चलने दिया
  और कुछ वो पल जो दोस्तों के सायो मे ना जाने कहाँ चले गए

 अब पास बैठा हु उन यादो को लेके , जिसके सिवाय मेरी कोई जायदाद नहीं
     काश  मेरे जाने से कुछ आखे तो नाम हो जाए, मोला मेरी इतने ही फ़रियाद है

  दुश्मन भी जब याद करे मे्रे ना होने को, तो बस इतना कह दे.
  कमीना था लेकिन आदमी दिलदार था 

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जिन्द्की उस खाव्ब सी, के हर सफे पर कुछ लिखने के ख्वाइस,  वक़्त की बस पलटने की आदत और हमारी नाफरमानी,
  देख अब तो सूरज ने भी शाम का दावतनामा कबूल कर लिया, और हम तो अब भी उठने की पेशोपेश मे है !  

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