Monday, 26 December 2016

शादी एक अभिशाप वीणा भाग २

भाग एक से आगे.......
   
 थोड़ी देर बाद उसे होश  आया, उसके चहरे पर पानी के चंद बुँदे पडी थी, और माँ के हाथ मे पानी का गिलास था| वीणा ने एक दो घुट पानी पिया, उसकी चेतना अब वापस आ गई थीं|  माँ ने निश्ठुर भाव से उसकी तरफ देखा और फिर नीचे जाने का इशारा किया |वीणा ने ध्यान से देखा, वहाँ पर एक चाय की ट्रे थी| वीणा चाय लेकर नीचे गयी, दुष्यंत का पूरा परिवार वहाँ मौजूद था, साथ मे  उसकी एक हम उम्र लड़की भी थी| उसका ध्यान दुष्यन्त पर गया, वो एक पर अधेड़ उम्र का  इंसान था, उसकी उम्र के दुगने से भी ज्यादा| वीणा को उसकी नजरे अपने ऊपर चुभ रही थी, वो शायद वीणा को ऊपर से नीचे तक घूरे जा रहा था |  गिद्ध की नजर एक बेबस  चिड़िया पर पड़ चुकी थी, जो की कई महीनो से पिंजरे में कैद थी, और अब तो उसके पंख भी नोच दिए गए थे | वीणा  पिछले छह महीने के दर्द को सिर्फ इसी उम्मीद के साथ सहन कर रही थी के शायद भविष्य के गृभ मे उसके लिए थोड़ी  खुशिया  हो, लकिन ये उम्मीद भी उसे अब छिनती हुई लगी । उसकी आखो के सामने अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था,  एक जीवन जो मित्रों और उमंगो के अध्यायों से भरा हुआ था, अब वह एक यातनाओ और दुखो के पथ की ओर अग्रसर था |


  थोड़ी देर बाद दुष्यंत के साथ बैठी लड़की वीणा के पास आयी और उसने बताया की  उसका नाम ज्योति है, और वो दुष्यंत की सबसे छोटी बहन है,  साथ मे उसने  बताया की उसके परिवार ने वीणा को पसंद कर लिया है | अब वीणा की भावनाये बेकाबू हो रही थी, वीणा की आखो से आसुओ की एक अविरल धारा बह निकली, ज्योति को लगा ये शायद ख़ुशी के आंसू है उसने वीणा को आगे बढ़ कर गले सी लगा लिया |  ज्योति नीचे गयी और उसने सबको बताया के वीणा इस फैसले से खुश है, दुष्यंत की माँ ने अपने पर्स से एक सोने की चैन निकली और वीणा की  माँ की ओर बढाई, वीणा की माँ ने उसे सर से लगाया और दोनों हाथ जोड़ लिए | सभी लोगो ने एक दूसरे को रिश्ता पक्का होने की बधाई दी |  दुष्यंत की माँ ने बोला, वो लोग शादी जल्दी चाहते है, दुष्यंत शहर मे अकेला रहता है, और वो लोग चाहते है की वीणा वहाँ जा कर उसके साथ रहे | यहाँ पर एक अपराध हो रहा था लकिन कोई भी न तो अपराध बोध से घिरा था न ही कोई एक लड़की के दर्द को समझ पा रहा था, हर कोई माँ बाप के फैसले से इत्तफाक रखता था |


  वीणा का दिल अब विद्रोह करने के लिए उतावला हो गया, उसकी हालत उस कैदी जैसी थी जिसको उम्र कैद की सजा दे दी गयी हो, उसका दिल और दिमाग बस वहाँ से भाग जाने की उदेडबुन में ही लगा हुआ था | आखिर शादी से दो दिन पहले उसने भागने का मौका मिला,  रात के लगभग १२ बज चुके थे और वीणा की आँखों से नींद कोसो दूर थी, दिल की  हर धड़कन उसे प्रतिपल  महसूस हो रही थी, वो धीरे से अपनी खाट से उठी, ना उसने अपना बैग उठाया न ही कुछ लिया, शायद अभी अपने को बचाना ही सबसे बड़ा उदेश्ये  था| वीणा ने धीरे घर का दरवाजा खोला, घर मे कुछ रिश्तेदार सोये थॆ|  उनसे बचकर वो  बाहर निकली, लकिन शायद आज उसकी किस्मत उसके साथ नहीं थी, उसकी मौसी की आँख खुल गयी,  उसने किसी को घर से बाहर जाते हुए देखा, वो जोर चिल्लाई वीणा अब सर पर पैर रख कर भागी | थोड़ी ही देर मे, घर के सब लोग जाग चुके थे, उन्हें ये समझने मे ज्यादा समय नहीं लगा के चिडीया पिंजरा तोड़ के उड़ गई |


उन्होंने पूरी शिद्दत से वीणा को फिर से पकड़ लाने की कोशिश  शुरू की, मानो  वीणा को वापस लाना ही अब इन लोगो की  जिन्दकी का एकमेव उद्देश्य हो|  कोई भी ये सोचना ही नहीं चाहता था, की गलत क्या है और सही क्या,  उन्माद सोचने कि शक्ति को समाप्त कर देता है | शायद उसी उन्माद से अब  लोग वीणा को ढूढने मे लगे थे | एक लड़की  जिसे वो शायद अब तक बहन और बेटी के तरह देखते थे,  आज उसे  एक दुश्मन की तरह ढूढने निकले थे| किस्मत भी आज वीणा के साथ आँख मिचोली खेल रही थी, या फिर अभी उसके भाग्य  मे लिखे दुःख पुरे नहीं हुए थे,  वीणा को मोह्हले के चोकीदार ने रेलवे स्टेशन कि तरफ जाते हुए देख  लिया|  घर वालो को अब ये मालूम था के वीणा किस तरफ गई है, सभी लोग स्टेशन की तरफ भागने लगे |


वीणा स्टेशन पर पहुची, उसने देखा के वहाँ एक माल गाडी खड़ी  है, भाग कर उसके एक डिब्बे मे छुप गयी| | वीणा जिस डिब्बे मे बैठी थी, वो कपडे के बंडलों से भरा  था, वीणा एक खाली जगह देख कर उसमे जा छुपी, इंतजार करने लगी के कब ये मालगाड़ी स्टेशन सी रवाना हो | स्टेशन पर १० मिनट बाद कोलाहल सुरु हो गया, कुत्ते गंध सूंघ चुके थे , डब्बे से बहार का शोर स्पृष्ठ सुनाई दे रहा था , जिसमे से कई आवाजे उसकी जानी पहचानी थी, वो आवाजे  जो अब  कर्कश हो चुकी थी|  शायद प्रेम की भावना को निकाल कर उनमे नफरत के अंगारे भर दिए गये हो  | "वीणा बाहर आ  जा " यही चारो और पुकारा  जा रहा था, लेकिन उसे पता था  बहार आने की सजा, आज लगभग ६ महीने बाद किसी से डर भी नहीं था|  लकिन थोड़ी देर बाद डब्बे मे कुछ आवाज आने लगी,  अब उन लोगो ने एक एक डब्बे के तलाशी सुरु कर दी थीं | वीणा ने अपनी आँखे बंद  कर ली, लेकिन उससे  दुर्भाग्य तो नहीं बदलने  वाला था, अचानक उसने अपनी कलाइयों पर दबाव महसूस किया, सामने  मंजू मौसी का बड़ा लड़का खड़ा था | उसने बाकी लोगो को आवाज लगाई, "यहाँ छुपी है" | बस  वीणा का बुरा काल आ  गया  था, चारो तरफ से  चप्पल जूते और ना जाने किस किस चीज से उसे मारा जाने लगा | तभी उसके नाना ने कहा की कल  इसकी शादी है, इतना मत मारो | फिर उसे पकड़ कर घर लाया गया, घर पर आ कर उसे किसी ने  कुछ नहीं कहा , माँ ने उसे चाय ला कर दि, चाय थोड़ी  कड़वि  थीं, लेकिन वीणा मे अब प्रश्न करने की हिम्मत नहीं थी | उसने चाय पी और थोड़ी ही देर मे उसे उसकी पलके भारी होने लगी, थोड़ी ही देर मे वो अपने होश खो चुकी थी |




वीणा को अपना होश खोये हुए लगभग ३ दिन हो चुके थे, आज थोड़ा थोड़ा  होश वापस आ रहा था| उसने चारो तरफ देखा,  हर तरफ अनजान लोगो का जमावड़ा था, इनमे से वो किसी को भी नहीं पहचानती थी, सब औरते उसकी ओर धयान से देख रही थी, कुछ उसे पैसे भी दे रही थी| उसे कुछ कुछ पिंजरे मे बैठे जानवर जैसी अनुभूति हुई | थोड़ी देर मे उसने ज्योति को देखा, अब भी उसे कुछ कुछ समझ नहीं आया  | ज्योति ने हँसते हुए कहा चलो भाभी को थोड़ा तो होश आया, नहीं तो लग रहा था भाभी अभी तक रात के खुमार से बहार ही नहीं निकली है | वीणा को उसकी बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन उसका शरीर और आत्मा दोनों दर्द  से भरे हुए थे|  थोड़ी देर बाद  एक वर्द्ध औरत ने वीणा और ज्योति को कमरे मे जाने के लिए कहा , वीणा तो शायद बहुत देर से इसी का इंतजार कर रही थी | कमरे मे जाते ही उसने ज्योति को पुछा कि उसके साथ क्या हुआ है, तब ज्योति ने बताया के उसकी शादी  दुष्यंत  से हो चुकी है | वीणा के माँ ने बताया था की  शादी के पहले  वो गांव देवता के पूजा करते हुए गिर गयी और गांव के वैध जी ने दर्द कम करने के दवाई दी थीं, तभी से  वो  थोड़ा बेसुध थी, अब उसकी  समझ मे सारा  माजरा आ रहा था,  दूध पिलाने वाली माँ ने ही उसे बेसुध करने कि कोई जड़ी चाय मे पिलाई थी | चिड़िया अब एक न सिर्फ पिंजरे मे कैद थी, बल्कि वो पिंजरा भी उसके लिए पूरी तरह से नया था | आत्महत्या या फिर इस पुरे परिवार के हत्या वीणा का अंतर्मन, एक बड़े झूले के तरह कभी इधर कभी उधर गोते लगा रहा था |  किसी भी लड़की की  जिन्दकी के सबसे खुशगवार पल, उसके लिए शायद वो कड़वे पल थे जिन्हें वो जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं |

 To be continued.......

Friday, 23 December 2016

वीणा का गुनाह -- Begining


यह कहानी एक लड़की के बारे में  है, जिसमे कुछ भी असामान्य नहीं था , वह एक सामान्य स्कूली  लड़की थी । उसका नाम  था वीणा  । उसके पिता एक कंपनी में सुपरवाइजर थे और मां घर पर ही रहती थी । उसके स्कूल थोड़ा दूर था जिसकी वजह से वजह  से सामान्यतः वो बस से जाती थी  । उसका  नीले रंग का  बैग और डिजाइनर हेयर पिन, जो उसके पिताजी पटना से खरीदा  था, उसके ट्रेडमार्क था।


                   बस स्टॉप पर वो दिन भी एक सामान्य  दिन जैसा ही था,  वह अपने दोस्तों से बात कर रही  थी साथ मे , जाने या  अनजाने मे  वो एक अंजान  लड़के  की ओर भी देख रही थी | यह लड़का भी एक सामान्य लड़का ही  था इसकी कमर पर  एक स्कूल बैग था  और  कपडे थोड़े गंदे थे। लेकिन उसके चेहरे पर चमक कुछ प्रकार के थी , जो वीणा  को उसे अनदेखा करने की अनुमति नहीं दे रही थी । अगले दिन फिर वही लड़का उसी जगह पर मिला , दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा ओर मुस्कुराये , बस फिर  दोनों वापस अपने घर चले गए । एक  महीने हो गया था,  फिर भी दोनों मुस्कान के आगे नहीं  बढ़े थे । एक दिन  आवारा लड़कों के एक  समूह उन दोनों को देखा और वे फिर वो  छेड़खानी पर उतर आए|  उन लड़को ने वीणा को हाथ लगाना शुरू किया , वीणा पीछे हठ गयी | वीणा के लिए जो हो रहा था वो बहुत कुछ अलग भी नहीं था,  क्योंकि उसने  इस व्यवहार को उसके जीवन के हर  पल  मे  देखा था । लेकिन लड़के के लिए शायद ये कुछ नया था  उसने अपने उन लड़को को मना किया , लड़को को ये नागवार गुजरा, जरा सी  देर मे ये छोटी सी बात  हातापाई  मे बदल चुकी थी  |


           अब समूह काफी  हिंसक हो गया और लड़का गंभीर रूप से घायल हो चला था  | उन्होंने वीणा को भी नहीं छोड़ा, जितनी गाली वो दे सकते थी वीणा को दी । वीणा को ना तो ये समझ आया की उसे किस बात की गाली दे जा रही है, न ये ही के वो लोग किसकी मर्जी से वो सब कर रही है । अंत में जब उन्होंने  देखा की  लड़का बेहोश हो गया है  वे उसे छोड़ कई घर की तरफ भाग गयी  | वह पर खड़े  कुछ लोगों ने उन दोनों के  परिवारों को सूचित किया।



            अगले 4-5 दिनों के इन 2 लोगों के लिए बहुत ही बुरे थे|   वीणा के लगभग रोज ही उसके माँ - बाप द्वारा पिटाई की गई थी, क्योंकि उन्हें  लड़ाई के बारे में पता चल गया था  और वे उसे  कोस रहा थे | वीणा को उस सब के लिए प्रातरित किया जा रहा था जो उसने किये भी नहीं था | वीणा के चीखे लगभग रोज मोह्हले मे गूंजती थी|  मोह्हले वाले भी उसे उसके किये का परिणाम बता कर पल्ला छाड़ लेते थे|


     एक सप्ताह  बीत चूका था वीणा को ना तो बहार जाने के इजाजत थी | स्कूल तो अब उसके लिए शायद हमेशा के लिए बंद हो चूका था | हर कोई उसे इस तरह सी   देखता था  जैसे उसने ना जाने कोन सी भरी गुनाह किया हो । जो पडोसी हमेशा उससे बात करते रहते थे वो अब वीणा  के साथ एक मुस्कान साझा करने के लिए भी जिझक रहे थे। वीणा का चेहरा जहा कभी हमेशा एक मुस्कान होते थी अब मुरछाया सा हो गया था , उसके जीने के उमंग  भी  शायद कही खो गयी थी  | उसके चहरे पर जब भी किसी भाव को आने की इजाजत मिलती तो वो भाव भी आपस में लड़ ही रहे होते  थे, कुछ जीने के भाव कुछ विद्रोह के भाव | माँ बाप तो शायद उसको सबक सीखाने की कोशिश  मे इतने खो चुके थे के उनको ये समझ ही  नहीं आ रहा था के जिसको वो प्रताड़ित कर रहे है वो कोई ओर नहीं उनकी ही अपनी बेटी है | वीणा की सबसे पक्की सहेली सयानी ने एक बार चुपके से उससे बात करने के कोशिश की लकिन उसका परिणाम उसे मिलने मे ज्यादा देर नहीं लगी | अगले दिन उसके फटे होठ ओर कान पर लगी चोट इस बात के गवाही दे रहे थे के रात मे उसके साथ क्या हुआ |


दूसरी तरफ लड़के के जीवन भी एक उतना आसान नहीं  था, माता पिता उससे दिन रात पूछ रहे थे की उसने ऐसा  क्यों किया । हर कुछ  बुरा जो अब तक उसके साथ हुआ था उसके लिए अब वीणा को जिम्मेदार बनाया जा रहा था |  उसके माँ बाप ने, वीणा के माँ बाप से भी आ कर बात  की,  ओर उसको नियंत्रण मे रखने के बात कह कर वो लोग वहाँ से चले गए । दूसरी तरफ जिन लड़कों ने उसे पीटा था  | उनसे कोई भी सवाल नहीं कर रहा था के उन्हें क्यों  एक लड़की के साथ ऐसा क्यों किया । कमजोर को पीड़ित करने का रिवाज आज वीणा को पूरी तरह से समझ आ रहा था |



स्कूल में, घर मे  हर कोई  एक ही सवाल  उससे पूछ रहा था की वीणा को उसने कैसे पटाया, वो तो बहुत ही छुपा रुस्तम निकल , ये सब कब से चल रहा था, अकेले में वो लोग कितने बार मिल चुके है | कोई भी ये बात नहीं समझ पर रहा था के वो लोग एक  बच्चे के मन के साथ खेल रहे  है जो के सिर्फ  15 साल का लड़का है, जो इस बोझ लेने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं है । लकिन ना तो उसे स्कूल जाने से रोका गया ना ही लोगो के दिल मे उसके लिए कोई नफरत थे बल्कि उसके लिए कुछ इज्जत थी के उसने ऐसा काम किया जो वो करना तो चाहते थी लकिन नहीं कर पाए | एक ही घटना के दो विपरीत परिणाम दो अलग अलग लोग भुगत रहे थे|




वीना के विचार  हर पल बदल रहे थे  | कभी वो गम के अंधेरो  में  होती तो  कभी  उसका  मन एक घायल शेर के तरह दुनिया को सबक सीखने को करता | कभी उसके मन में उठ रहे प्रश्न का पहाड़ होता तो कभी कुछ छोटे सवाल अपने  माँ बाप के लिये होते तो कभी उस समाज के बेइंतहा नफरत होती जो उसे पता नहीं किस गुनाह के सजा दे रहा था |  कभी वो  और थोड़ा आक्रामक होती तो कभी पीछे हठ कर अपने को अपने आप में समेट लेती। उसका सवाल  माता-पिता के लिए काफी जायज था, के अगर वो मोहन के साथ भाग गयी होते तो क्या वो जायद खुश होते या फिर   उन लड़कों उसके साथ बलात्कार किया होता तो वो जायद निशिन्त होते । सामाजिक धागे में उलझा एक मन हर समय तर्क वितरक पर उतारू था। वो समाज को एक सबक सिखाने को भी आतुर था, लकिन रिस्तो के उन अनचाहे बंधनो ने उसे विवश कर दिया था | माँ जो के कभी वीणा को अपने आँचल में दबा के रखती थी वो अब उसे सबक सिखाने पैर उतारू थी | यह संग्राम अब  महिला बनाम  महिला हो चूका था | एक माँ अब वीणा को  एक दुश्मन की तरह  देख रही है। कई विकल्प उसके  मन  में आ रहे थे मार देने का विचार, शादी का विचार। एक बचपन उनके द्वारा कुचला  ही जा चूका था अब ये लोग वीणा के  जीवन के साथ खेलने के लिए और ज्यादा हिंसक होते जा रहे हैं। वीना को कभी कभी डर ​​लगता था , लेकिन वह जानता है कि यह समाज एक  महिला पर क्या प्रतिक्रिया करता है|



यह सामान्य दिन था | 14 वर्षीय वीना के लिए, उसके चाचा और चाची को कुछ समय के बाद उसके घर आ रहे थे । वे दोनों जमशेदपुर के पास एक कसबे मे रहते थे | वीणा भी अपने चहरे भाई बहनो को देख कर काफी खुश  थी | लगभग 4 महीने के बाद उसे कुछ दोस्तों के साथ मिला था । लेकिन बच्चो के  मन में एक झिझक को  स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था । वे लोग  हमेशा वीणा से  कुछ दुरी बनाये रखते थे । जब माता पिता को एक बार बहार गए तो उन लोगो ने बताया के चाचा चाची ने  वीना वीणा से  दूर रहने के लिए कहा है। वीना फिर से अपने पुराग्रहो में फास गयी  इसके  बावजूद के उसने कुछ भी गलत नहीं किया था वो अपने को अपने  माता पिता के लिए एक अभिशाप के रूप मानने लगी थी।  वीणा जा कर भगवान् की मूरत के सामने बैठ गयी लकिन शायद भगवान ने भी उस से मुह फेर लिए था | या फिर भगवान् के पास भी उसके सवालो के कोई जवाब नहीं था तो उन्होंने भी चुप रहना बेहतर समझा |

  माता-पिता  और चाचा चाची ने  वीणा  के बारे में बात करना किया । शायद भारत में हर समस्या के एक ही समाधान होता है  शादी | चाचा-चाची ने भी वीणा के लिए ये ही सुझाव रखा, उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले एक 30 साल का आदमी दुष्यंत के बारे मे भी बताया |  उन की नजरो मे वो  14 साल की लड़की वीना लिए  बिलकुल सही था । माता-पिता को इस विचार के लिए शायद थोड़ा तैयार नहीं थे। उनके विचार मे ये एक छोटी समस्या से निपटने का एक   जटिल मार्ग था । उनके लाल चेहरे और माथे पर पड़ी रेखाएं  अब एक दूसरे से लड़ रहे हैं। वे अपने  विचारों में वीना कई समय मार चुके थे, लेकिन अब यह  विचार न सिर्फ उसके पूर्णतः  मौत के था, बल्कि गिद्धों के तरह उसके  मृत शरीर को नोचने जैसा भी था । पहली बार डर लगा, लेकिन इसके लिए दुनिया में सबसे अच्छा अभ्यास है अपराध पर चर्चा करो और 2-3 दिनों के बाद  वही जग्नय अपराध अमल करने के लिए आसान हो जाएगा।

  दो दिन के बाद  दुष्यंत उसे देखने के लिए आया, वीणा को एक दुल्हन की तरह तैयार किया गया| वीणा अपने भविष्य से  पूरी तरह से वाकिफ थी । उसे अपने को तैयार करना अंदर ही अंदर खाये जा रहा था, उसे  लग रहा था इससे अच्छा होता के वो उसकी अर्थी सजा देते ।  वीणा ना चाहते हुए भी तैयार हुई और नीचे गयी | उसका मन और शरीर अब साथ नहीं दे रहा था वापस आ कर वो बिस्तर पर गिरी और बेहोश हो गयी |

  जारी  है............