Friday, 10 June 2022

गुम

बहारे कल फिर आयेंगी पर जाने हम कहाँ होंगे,
 ये रास्ते माना चल नहीं सकते, नहीं तो बया करते

 हर उस पल को जो मुझे झंझोड़ सा गया था,
  हर उस सपने को, जिसे तोड़ के मैंने जीना सीखा

 हर उस हवा के झोंके को जिसने मुझे कुछ और दूर चलने दिया
  और कुछ वो पल जो दोस्तों के सायो मे ना जाने कहाँ चले गए

 अब पास बैठा हु उन यादो को लेके , जिसके सिवाय मेरी कोई जायदाद नहीं
     काश  मेरे जाने से कुछ आखे तो नाम हो जाए, मोला मेरी इतने ही फ़रियाद है

  दुश्मन भी जब याद करे मे्रे ना होने को, तो बस इतना कह दे.
  कमीना था लेकिन आदमी दिलदार था 

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जिन्द्की उस खाव्ब सी, के हर सफे पर कुछ लिखने के ख्वाइस,  वक़्त की बस पलटने की आदत और हमारी नाफरमानी,
  देख अब तो सूरज ने भी शाम का दावतनामा कबूल कर लिया, और हम तो अब भी उठने की पेशोपेश मे है !  

Sunday, 26 March 2017

दुर्घटना

अभिमन्यु का जीवन  काफी  ऊँचे नीचे रास्तो से हो कर गुजर था | माँ स्कूल टीचर थी, तनख्वा मे बस काम चल जाता था | बचपन से हे अभिमन्यु अत्यंत मेधावी छात्र था | उसने हर क्लास मे न सिर्फ अच्छे अंक अर्जित किये बल्कि छात्रवृत्ति लेकर माँ का बोझ कुछ काम किया | उसकी एक मुह बोली बहन प्रेरणा भी थी, अभिमन्यु के पापा के दोस्त की बेटी | प्रेरणा २ साल की ही थी जब एक नशे में धुत ट्रक वाला उसे आनाथ करके चला गया था |  रिश्तेदारो  ने जब रिस्ते के भाव और प्रेरणा को पालने के खर्च को जब भी टोला उसे पालने का ख़र्च हमेशा जायद नजर आया |  लेकिन रिश्तेदार भले ही रिश्ता छोड़ दे, दोस्त दोस्ती कैसे छोड़ता, आखिर अभिमन्यु के पिता उसे घर ले आये | एक दिन ये दोस्त भी अपने दोस्त के पास ही चला गया,इन चारो को इस दुनिया मे अकेला छोड़ के | अभिमन्यु की माँ ने पुरे घर का बीड़ा अपने कंधो पैर लिया, और दोनों को पढ़ाया लिखाया | अभिमन्यु ने आईएम से अपना  MBA पूरा किया,  प्रेरणा ने भी MCA कर लिया था | प्रेरणा की शादी उसके ही कॉलेज मे पड़ने वाले अलपेश  से हुई और धीरे धीरे उनका परिवार बढ़ा, अभिमन्यु को मामा कहने  वाली  अब  दो  छोटी  बेटिया थी प्रेरणा की|  अभिमन्यु ने अब तक शादी नहीं की थी | प्रेरणा नौकरी छोड़, अभी बेटियो को संभाल रही थी  | अल्पेश एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मे चीफ इंजीनियर था, और उसकी तन्खा काफी थी घर चलाने के लिए, बस समय बीतता जा रहा था |

   अभिमन्यु को स्कॉटलैंड की एक बड़ी कंपनी ने अपने कंपनी मे काम के लिए बुलाया | दो साल स्कॉटलैंड मे रहना था, वापिस आकर उसी कंपनी की पूरी फैक्ट्री इंडिया मे खोलने का कॉन्ट्रैक्ट था | अभिमन्यु के लिए ये जैसे उसका मनचाहा काम था, उसने हामी भर दी और वीसा और सभी कागजात पुरे हो गए|  ३ फ़रवरी को उसे जाना था | माँ खुश थी, ६ महीने बाद वैसे भी वो मिलने आ ही रहा था | ३ फ़रवरी को जैसे ही उसे जाना था माँ के तबियत थोड़ा ख़राब हो गयी, डॉक्टर को बुलाया, डॉक्टर ने बोला कुछ खास नहीं है थोड़ी कमजोरी है | अभिमन्यु ने टाइम देखा ३ घंटे थॆ फ्लाइट मे, उसे टैक्सी वाले से थोड़ा जल्दी के लिए कहा | टैक्सी वाला एकदम नोजवान था, बोला सर आपको ४० मिनट मे पंहुचा देंगे | थोड़ी देर मे वो लोग एयरपोर्ट की तरफ उड़े जा रहे थी, फ़रवरी के कारण वाहन भी सड़क पर काम ही थॆ | अचानक टैक्सीवाले ने सीधे हाथ पर गाडी को जबरदस्त काट दिया, दूसरी तरफ सी आ रहे मोटर साइकिल वाले के लिए ये बिलकुल अप्रत्याशित था | बडा ही धमाका हुआ मोटर साइकिल वाला दूर जा कर गिर पड़ा | अभिमन्यु कुछ बोलता उससे पहले टैक्सी वाले ने टैक्सी भगा ली | बोला सर आपको लेट लोग अगर रुके तो और पुलिस केस भी हो जाएगा |  अभिमन्यु कुछ निर्णय नहीं ली पाया | टैक्सी वाले ने उसे एयपोर्ट के बहार छोड़ा, बोला टूटी गाड़ी लोग देखेगे तो पुलिस वालो को शक हो जाएगा, मे जाकर अम्बुलन्स को वह भेजता हु | अभिमन्यु थोड़ा सा स्वार्थी हो गया, वो जा कर अपने कागजात पुरे करने लगा | थोड़ी देर मे ही वो स्कॉटलैंड के लिए उड़ चूका था |


स्कॉटलैंड मे उसके जीवन ने एक और उड़ान ली| एक दिन अभिमन्यु जब ऑफिस जा रहा था, उसने देखा कोई एक लड़की पर जोर जोर से चिल्ला रहा है, अभिमन्यु ने उन लोगो से अपना मामला घर मे जा कर सुलझाने के लिए कहा, लेकिन उस लड़के को अभिमन्यु की बात थोड़ी नागवार गुजरी, और उसने एक घुसा अभिमन्यु के मुह पर दें दिया, तभी उस लड़की ने उस लड़के को दूर जाने के लिए बोला | वो अभिमन्यु को अपने घर ली गयी, अभिमन्यु को प्राथमिक  चिकित्सा देने का बाद उसने अपना नाम इस्ला बताया |  इस्ला उसके ऑफिस के अपार्टमेंट के सामने हे रहती थी | दोनों मे थोड़ी बाते होने लगी, इस्ला ने बताया लड़का जिससे उसका झगड़ा  हो रहा था उसका बॉयफ्रेंड था | कुछ दिनों बाद अभिमन्यु और इस्ला ने आपस मे प्रेम का इजहार किया और ३ महीने बाद दोनों ने शादी कर ली |


 इस्ला स्कूल मे टीचर थी | एक दिन अभिमन्यु एक मीटिंग मे था, उसे एक अनजान नंबर से कॉल आया, अभिमन्यु ने नजरअंदाज किया, लेकिन अगले ही पल फिर से उसी नंबर से कॉल आया | अभिमन्यु ने उठाया तो पता चला इस्ला का एक्सीडेंट हो गया है, जिस बन्दे से एक्सीडेंट हुआ वो उसे लेकर पास के अस्पताल मे ली गया, चोट थोड़ी ज्यादा थी लेकिन समय पर लाने के वजह से उसे कोई जान का खतरा नहीं था | अभिमन्यु तुरंत अस्पताल पहुँचा, वो उस बन्दे से भी मिला, थोड़ा गुस्सा था, लेकिन उसने बताया इस्ला फ़ोन पर बात करते हुए जा रही थी, उसने नहीं देखा की वो रेड लाइट मे रास्ता पार कर रहे है, और ये दुर्घटना हो गयी |  अभिमन्यु थोड़ा शांत हुआ, ३-४ दिन बाद इस्ला घर आ गयी, अभिमन्यु ने २ हफ्ते की छुट्टी ले ली थी | कुछ दिन बाद इस्ला काफी सामान्य हो चुकी थी, जिन्दकी फिर पटरी पर दौड़ने लगी |


२ साल बीत गए, अभिमन्यु ने अब वापस जाने का फैसला किया, इस्ला और वो दोनों अपने भविष्य को ले कर काफी खुश थे |  अभिमन्यु के दिन कटने का नाम नहीं ले रहे थे, दिमाक मे बस यह चल रहा था, चलो माँ और प्रेरणा से मिलूंगा | प्रेरणा से ज्यादा बात नहीं हो पाती थी, जब भी उसने फ़ोन किया नंबर घंटी बजने के बाद बंद हो जाता | आखिर वो दिन आ गया, इस्ला ने सामान पैक कर लिया, लगभग २० घंटो बाद वो लोग अपने घर के दरवाजे पैर खड़े थे, माँ शायद इन्तजार ही कर रही थे, उसने दरवाजा खोला, माँ बेटे के आँख से आंसू टपक पड़े | १-२ घंटे के बाद अभिमन्यु ने पूछा प्रेरणा कहा है, कभी बात ही नहीं हुई उससे| माँ ने एक गहरी सास ली और अभिमन्यु से लिपट के रोने लगी, "प्रेरणा ने कसम दी थी तुझे बताने को, अलपेश हमे उसी दिन अकेला छोड़ के चले गए थे|  प्रेरणा पहले तो बस सदमे मे ही थी, लेकिन कुछ दिन बाद उसने मुझे फ़ोन किया और कभी उससे मिलने न आने की बात कह कर फ़ोन रख दिया | मैंने काफी कोशिश की लेकिन प्रेरणा से कभी नहीं मिल पायी, समाज मे उसके बारे मे उल्टा सीधा सुनती रहती हु, लेकिन मिलना नहीं हो पता, दोनों बच्चे भी पंचगनी हॉस्टल मे रहते है, वो उनसे मिलने भी नहीं जाती |

अभिमन्यु अवाक् था, परेशान था, प्रेरणा जिसके साथ सारा बचपन बीता, वो आज इतना दूर कैसे चली गयी| उसने उसी ढूढने की कोशिश सुरु की लेकिन पता ही नहीं चला, मानो उसने अपने सारे जड़ो को एक एक कर काट दिया था | उसकी फैक्ट्री का काम भी सुरु हो गया गया था, और वो पागलो के हद तक व्यस्त था | इस्ला भी उसके काम मे हाथ बटाती, एक रोज इस्ला की मीटिंग ताज पैलेस मे थी, बहार निकलते हुए उसने एक लड़की को देखा, उसी लगा वो इस लड़की को पहचानती है, पर उसे ध्यान नहीं आ रहा था, वो कार वापस घूमाने वाली ही थी की उसे याद आया वो तो प्रेरणा थी, उसके फोटो घर मे इतने जगह लगी हुई थी, की उसे ऐसा लगता था की वो उसे कई बार मिल चुकी है| उसने तुरंत अभिमन्यु को फ़ोन किया, अगले १०-१५ मिनट मे अभिमन्यु आ चूका था| अभिमन्यु ने रिसेप्शन पर जाकर प्रेरणा के बारे मे पुछा, रिसेप्शन पर लोगो ने असमंजस मे उनकी और देखा | उन्होंने कहा प्रेरणा नाम की कोई गेस्ट नहीं है, अभिमन्यु ने बाहर जा कर थोड़ा इंतजार करने का फैसला किया| आखिर मे २ घंटे बाद उसने प्रेरणा को बहार आते हुए देखा, वो अचानक प्रेरणा के सामने आ गया, प्रेरणा शायद इस टकराव के लिए तैयार नहीं थी | अभिमन्यु ने उसे कार मे बैठने का इशारा किया, चुपचाप वो कार मे बात गयी | थोड़ी देर बाद प्रेरणा और अभिमन्यु घर पर थॆ, अभिमन्यु सवालो के तरकश के साथ तैयार खड़ा था, प्रेरणा निढाल हो कर सोफे पर पडी थी |

 अचानक प्रेरणा की रुलाई फुट पडी, जाने कितने दिनों का विष मन मे भर हुआ था, उसके दिल मे  जो आज फुट फुट कर बाहर आ रहा था, उसने बताया जिस दिन वो स्कॉटलैंड के लिए गया, उसे दिन अल्पेश घर वापस आ रहे थॆ, रस्ते मे उनकी गाडी ख़राब हो गयी, उनका अस्सिटेंट उसी रस्ते से वापस आ रहा था, उसके उन्हें अपनी बाइक दी और गाड़ी के पास रुक गया, रास्ते मे किसी ने उनकी बाइक तो टक्कर मारी और उन्हें मरता हुआ छोड़ कर चला गया, ४-५ घंटे वो रस्ते मे तड़पते रहे, लगभग सुबह के ५ बजे किसी ने उन्हें पड़े हुए देखा, लेकिन तब तक जिन्दकी हार चुकी थी | उनके मरने के बाद पता चला के उनके ऑफिस मे कोई टर्म पालिसी नहीं है | उनका बिमा सिर्फ १० लाख का था, वो रकम तो लगभग ४-५ महीनो मे ही ख़तम हो गयी, नोकरी के लिए न जाने कितने चक्कर लगाए, हर कोई जिस्म फरोशी के लिए तो तैयार मिलता लेकिन काम के लिए नहीं| थक कर उसने अल्पेश की फैक्ट्री के मालिक से दूसरी शादी कर ली, बाद मे पता चला के उसके लिए, प्रेरणा मन बहलाने से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन अब वो प्रेरणा के घर का खर्च चला रहा था, प्रेरणा ने भी समय से समझौता कर लिया |

अभिमन्यु सुन कर हतप्रभ था, उसे समझ आ गया था, प्रेरणा के जीवन मे आये इस उथल पुथल के पीछे वो ही है | लेकिन अब देर हो चुकी थी, अभिमन्यु आज उस दिन को कोस रहा था, जब उसने अल्पेश को मरता हुआ छोड़ा था | उसने प्रेरणा के बच्चो के पूरी जिम्मदारी लेने का फैसला किया |  लेकिन आज उसे समझ आया हर गुनाह पीछा करते हुए कभी न कभी सामने आता है |






Thursday, 9 March 2017

Self Belief

Self-Belief 




Nihita has been working in the IT since last 20 years, her life was woven with all complexity and generality of  IT.  But past few days were disastrous to her, she lost her husband Vijit  in a car accident and herself was seriously injured. It was 24th day since accident when she regain consciousness.

She has all friends around but a lot challenges has to face, this is day when she back home and  realize that her son Anirvan not very much responding to her. She was still no recovered from the loss and instead of getting support, her son somewhere put the blame on her for the loss. She caught him smoking in the afternoon and then the whole world broke,  Anirvan voice was very straight and blunt "Due to you I lost my Dad, why not you died, you killed him, you never like him".   A young mind was now full of all filth, Nihita is almost broken. He was the only reason to make him alive and such words are like melted glass to her ears. She decided to end her life, this idea sound great to her, end to all sorrows in one minute.

In the afternoon she wake up with all dull mind, her phone was constantly ringing.  Her leaves was now  over, her HR was calling  her to join she told she will come tomorrow, which she know will never going to come in her life. Now she first want to give all bank account all financial information to her son so that he should not be having trouble post her life. Due to this she open some of the old boxes and now her marriage pictures was in front of her, and thought starts flowing, her life before the marriage, how much her parents was happy to see her happy, Her dress and the day of marriage, the day Anirvan came to their life, his first touch, his softness, his first voice. Her efforts to make him speak, every night she spend  when he was ill. The days when doctors told she can never be mother again. Her first loss her father …Now thoughts are becoming stronger, when she has not let his son go when he was not speaking at all and now her life can’t be alone finish due to the person she bring on this earth,  now her mood is swinging.

In evening she sit with the sleeping bills, a series of thoughts start coming to her mind.  Her father was a firm believer on her, even when all the odds are against him to send her to engineering college he supported and when her husband was going through the lowest period of life her father convey full support on her and then life became on track.  Her husband Vijit came to her many time with his problems, now with one problem she is ending her life when she knows it’s a reaction of great loss. She is firm now and throw all he pills in dustbin and move towards Anirvan.


She called Anirvan to her room, there was a deep silence in the room, she then start speaking  "Anirvan I don’t know why you think I am responsible for your father death, while we both in same car and it could be any one and I would be happy to choose his life over min if given a choice. Anirvan its up and down of life we supported each other in every movement, yes there was fight but there was a lot of love also. Vijit and you are my life, I know l lost him to due to the incident which was out of my control but I want to live life for you, for me. I know just because of small disputes between us lead you to this conclusion but believe me this is part and parcel of married life where two people agreed and disagreed on daily basis but it does not make their love less to each other. I love you and Vijit and will continue to do so but I want your support to overcome this grief. Her voice is getting stronger Life is not certain but I am there for you and with my love, but you tell me why you make me guilty without hearing anything from me.

Anirvan now start melting, all the pain in his heart is coming out slowly, his crying can be easily heard from the outside. His eyes now flowing will tears, he suddenly stand up and hug Nihita tightly.  Nihita also burst into tears but with a joy to have her son back. Now sun is moving down with a hope of a new and bright day ahead.

Saturday, 4 March 2017

एक कदम भविष्य की ओर


   एक कदम भविष्य की ओर 


वीणा  के  अगले  दो  हफ्ते  शायद  नरक  से  भी  बदतर  थे | वो  उस  हर  यातना से  हो  कर   गुजरी  जिसके  बारे  ही  सोच  कर  रूह  तक  काँप  उठती  है | दुष्यंत  की  माँ  को भी शायद  अभी  कुछ  भनक  लग  चुकी  थी  की  वीणा  के  माँ  बाप  ने  उसकी  शादी  इतनी  जल्दी  मे   क्यों  की  थी | अब  तो  वीणा  पर  यातनाओ  की   बाढ़  आ  गयी . हर एक  दिन  शायद  वीणा  की   सहन शंक्ति की  पराकाष्ठा  का  इम्तहान  ले  रहा  था |  वीणा   एक  अरमानो  की   लाश  से  ज्यादा  कुछ  भी  नहीं  थी |  हर  रोज  उसकी  आत्मा  और  शरीर  वो  सब  झेल  रहा  था , जिसकी  इजाजत  ना  तो  इस  देश  का  कानून  देता  है  ना  ही  मानवता . वीणा  को  अभी  दुष्यं  एक  कुत्ते  से  जायद  कुछ  नजर  नहीं  आता था  जो  रोज  उस  लाश  से  कुछ  मॉस  नोच   कर  चला  जाता  था जिसका शिकार किये उसे अरसा हो चूका था | ना  अभी  उसकी  भावनाओ  और ना ही उसकी चीखो को  कोई  सुनने  वाला  था . वीणा रात मे जब भी रोती थी ज्योति उसके पास कर उसका गम हल्का करने के कोशिस करती थी| वीणा के दिल से उठने वाली हर रुलाई शायद अभी उस घर से बहार नहीं जा रही थी | काश भगवान होता और शायद वो अपनी बनाई हर चीज़ का ख्याल रखता तो आज एक बचपन इस तरह ना रौंदा जा रहा होता, लकिन जब माँ - बाप ही दुश्मन हो जाए तो पारयो से क्या  शिकायत करना. वीणा के तो अपने माँ बाप ने उसके यहाँ भेजा था | वो तो अपने रोने के कारण के लिए  भगवान से मौत  भी नहीं मांग सकती थे | जो भी हो वो उसके अपने माँ बाप ही थे, उन्होंने भले ही वीणा को अपने दिल में मार डाला हो वीणा ने उन्हें अभी भी दिल में जगह दी हुई थी.|


आज लगभग १५ दिन हो चुके थे | वीणा ने इस दुःख का अंत करने का निर्णय लिया और अपने कुछ कपडे और जेवर समेटे, साथ मे एक ब्लेड भी लिया जो उसने दुष्यंत के दाढ़ी बनाने के बॉक्स से चुराया था, निर्णय बहुत साफ़ था,इस बार अगर पकड़ी गयी  तो मौत तो गले लगाना ज्यादा अच्छा था | उवो मौत शायद उसकी आज की जिन्दकी से ज्यादा आसान थी |  वीणा को पता था गाँव से कुछ दूर पे एक बस स्टॉप है,और आखरी बस १० बजे आती थी | वो घर से लगभग ९ बजे निकली और उसके दिल के धड़कन बहुत तेजी से चल रही थी सास फूल रही थी, लकिन वो नही रुकी नहीं, इस अँधेरे रास्ते के पार उसका कुछ सुखद भविष्य हो सकता था | वो पसीने से लथपथ थी लकिन कैद से आजाद होने की ख़ुशी के आगे ना तो कोई थकान थी ना ही रुकने का कोई कारण | लगभग  १५ मिनट  बाद वो बस स्टॉप पर पहुची  उसने अपने दुप्पटे को अपने सर और चहरे पर डाल लिया | वैसे तो उसके यहाँ पर कोई नहीं पहचानता था लकिन एक लड़की आज बंधन तोड़ के बहार निकल जाना  चाहती थी | हर एक पल जो बस के इंतजार मे काट रहा था वो एक एक साल के बराबर था | तभी वह पर कुछ लोग आये  वीणा की धड़कन अब बढ़ती  जा रही थी वो हर चहरे मे अपने कैद देख रही  थी |

कुछ देर बाद बस आई, वीणा ने एक चैन की सास ली, शायद उसके दुखो का ये आखरी पल था | वो बस मे बैठी बस चलने को ही थी  के किसी ने बस तो रुकने के लियॆ कहा, वीणा को लगा शायद वो पकड़ी गयी | उसने दुपट्टे मे से झांक कर पीछे देखा, एक अधेड़ उम्र का जोड़ा पीछे से आ रहा था | महिला को शायद चलने मे कुछ परेसानी थे जिसके कारण वो लोग धीरे धीरे आ रही थे | वीणा ने चैन के एक सास ली और अपने सामान को अपनी गोद मे दबा कर बैठ गयी | बस ने अब कुछ रफ़्तार पकड़ ली थी, बस का परिचालक उसके पास आया और टिकेट लेने के लिए कहा | वीणा असमंजस मे पड़ गयी उसने तो ये सोचा ही नहीं था के जाना कहा है |


वीणा का दिमाक लगभग सुन्न पड़ चूका था | उसको कुछ भी सूझ नहीं रहा था, तभी पीछे से आवाज आई "ये हमारे साथ है " | परिचालक पीछे चला गया, वीणा ने पीछे मुड़ कर देखा, अभी अभी जो जोड़ा बस मे चढ़ा था उन्होंने उसका टिकेट ले लिया था | लगभग 3 घंटे के बाद बस अपने आखरी पड़ाव पर पहुची, बस ध्रीरे धीरे खाली होने लगी, रात के लगभग १ बज चुके थे | वो जोड़ा वीणा के पास आया शायद उन्होंने वीणा की परेशानी को थोड़ा तो समझ लिया था | उन्होंने वीणा को अपना परिचय दिया, महिला ने अपना नाम आशा और अपने साथ वाले पुरुष का नाम राठौर बताया, उन्होंने उससे पुछा के अभी उसके पास जाने के लिए कोई आसरा है | वीणा ने सर ना मे हिलाया, न जाने क्यों वो इन दोनों से अजीब से बंधन मासूस कर रही थी |

 आशा और राठौर उसे अपने घर ले आये| उन्होंने पहले उससे उसकी पूरी कहानी पूछी, अब वो समझ चुके थी के वीणा एक भारी मुसीबत का सामने कर चुकी थी, उन्होंने उसे बताया के वो उसे ले कर पुलिस मे जा सकते है, वीणा लकिन अभी भी काफी डरी हुई थी, वीणा ने जाने के लिए इंकार कर दिया, दूसरा वो अब उस जीवन मे वापस नहीं जाना चाहती थी | आशा और राठौर असमंजस मे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था के वो क्या करे | उनकी नजरो मे ये एक पुलिस का मामला था, लकिन ऐसे मामलो मे पुलिस क्या करती है उन्हें पूरा मालूम था, आखिर उन्होंने अपने बेटे से बात कि, उसने उन्हें सलाह दे के वो उसे  चैन्नई मे उसके दोस्त कि संस्था के पास भेज दे | वीणा को लेकर २ दिन बाद वो चैन्नई पहुचे |


आज वीणा को कुछ भी डर नहीं लग रहा था, जानिब इसके के वो बिलकुल अनजान लोगो के साथ थी | इस संस्था मे उसकी मुलाकात अपने जैसी कई लड़कियों से हुई, दुःख भी अजीब है, अगर एक तरह का हो तो लोग दोस्त जल्दी बन जाते है | वीणा ने पढ़ाई फिर से सुरु कर दी और अभी वो एक सुखद भविष्य की और चल चुकी थी |








Sunday, 8 January 2017

विमुद्रीकरण


विमुद्रीकरण 


 राम किशोर मराठवाड़ा का एक छोटा सा किसान है जो अपने परिवार को जाने कैसे पाल रहा था उसे ही पता था | उसका गांव झाबेली औरंगाबाद से लगभग ६० कोस के लगभग होगा| सुख सुविधाओ का मामले में तो ये औरंगाबाद से लगभग ६०० साल पीछे है | इस गांव मे बिजली के खम्बे आये तो लगभग ५ साल हो चुके है , लकिन बिजली चुनावो का अलावा शायद ही कभी आती है | गांव का एकमात्र सम्बन्ध बाहरी दुनिया से बस है जो हफ्ते मे तीन दिन झाबेली तक आती है |  इस गांव मे ज्यादातर किसान पैसे के लिए गन्ने पर ही निर्भर है | लकिन न जाने भगवान इस जगह से क्यों नाराज था, तीन साल हो चुके थे लकिन इस गांव मे बारिस लगभग ना के बराबर ही पडी थी  | किशोर की माँ कई बार बोल चुकी थी  कि लगता है इस बार भगवान शायद कुछ ज्यादा ही नाराज हो गए है , ना जाने कोन  भूल हो गयी| पंडित जी के बताये रास्ते भी पिछले २ सालो मे इतनी बार फेल हो चुके थे के लगता था की भगवान न सिर्फ नाराज हुए है बल्कि मंदिर से भी चले गए है, पंडित जी अब शायद बे मन से ही आरती कर रहे थे, उन्हें भी शायद नहीं पता था आगे क्या होने वाला है | बस किसी तरह जिन्दकी चल रही थी, हर रोज खाने की  जद्दोजहद मे ही गुजर रही थी |

 किशोर का बड़ा बेटा निर्मल , तंग आ कर  मुम्बई चला गया था, खेती करने वाले उसके दोनों मजबूत हाथ आज लोगो की जूठन धोने को मजबूर थे| पर इस देश का दुर्भाग्य है, जय जवान जय किसान का नारा दे कर किसानों को सैनिको जैसा सम्मान तो दिया गया पर कभी भी उनके जीवन की  जद्दोजहद को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया| निर्मल जो दो बैलो के साथ अपने खॆत जोतते  जोतते बड़ा हुआ, आज जीवन ने उसे अपना बैल बना लिया| लकिन उसके काम की वजह से ही आज उसके घर मे चूल्हा जल  रहा था, उसके दोनों भाई जो पढ़ रहे थे, उनका ख़र्चा भी उसके ही जिम्मे था | मुम्बई जहाँ लोग अपने सपनो को जीने आते है वहाँ ये जीवन शायद अपने सपनो को मार कर दुसरो के जीवन कि भट्टी मे अपने जीवन का कोयला डाल रहा था | निर्मल को अपने घर के याद तो आती थी, लेकिन वो जानता था छुट्टी का मतलब, इस बैल को तो शायद बीमार रहने का भी अधिकार नहीं था | कभी कभी जीवन, की क्रूरता उसकी आखो को नम करती थी लेकिन वो फिर फिर अपनी शर्ट से आंसू पोछता और काम पर लग जाता|

किशोर का शरीर अभी थोड़ा थोड़ा साथ छोड़ने लगा था | पिछले २ सालो से वो उस जमीन को बो रहा था, जिसमे बीज और मेहनत तो जा रहे थे पर बारिस ना होने की वजह से कुछ बाहर  नहीं  आ रहा था | इस बार भी अगस्त आ चूका था, चारो तरफ बारिस हो रही थी, सिर्फ ये ही जमीन प्यासी थी, पंडित जी ने एक दिन गुस्से मे आ कर मंदिर का ताला लगा दिया, बस अब और नहीं इतने भी जुल्म मत करो भगवान, अब बस भी करो |

किशोर के लिए ये बुवाई का समय था, इस बार तो बीज के लिए पैसे भी नहीं थी, उसका मन हुआ निर्मल से बात करे,लेकिन दूसरे ही पल ख्याल आया, गूंगे बैल के कंधे पर इतना भी बोझ ना डाले के वो कन्धा ही टूट जाए | आखिर उसने बैंक जाने का मन बनाया, वो सुन रहा था किसानों को सरकार कम कीमत में  बीज उपलब्ध करा रही है | आज ना जाने वो कितने सालो बाद गांव से बाहर आया था, बस से उतर कर वो सीधा बैंक गया, शायद इतनी  साफ़ और चकाचोंध  से भरी कोई जगह उसने  सपने मे भी देखि हो | थोड़ी देर बाद उसका नंबर आया, बैंक मेनेजर के सामने वो हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया, मेनेजर ने उसकी और एक धिक्कारता भरी नजर डाली, शायद वो बोल गया था ये कहा से आया साला| उसका व्यव्हार शायद हमारे सामाज का ही दर्पण था | मेनेजर ने उसे कुछ फॉर्म भर के आने के लिए कहा, बोला सब कुछ होने के बाद लगभग २० से २५ दिनों मे उसका लोन पास हो जाएगा |

किशोर के पास उतना समय नहीं था, आखिर उसने फिर से मंडी का रुख किया, मंडी जो अब शायद गिद्धों के बस्ती थी, यहाँ पर पैसा मिलना आसान था लेकिन पीढ़िया बीत जाती थी उसी ख़तम करने मे, आखिर लाला अमरनाथ जी के यहाँ से उसे २ रूपये सैकड़ा पर लोन मिला | किशोर ने वापस से आकर आपने बूढ़े बैलो को हीकरा | फिर से एक आशा के साथ वो लोग बुवाई मे लग गए, आशा से बड़ा कुछ नहीं, एक किसान ही है जो लाख मुसीबत उठा कर भी फिर से धरती माता को अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार हो जाता है |

२ दिन बीत चुके थे, बारिस का कोई नामो निशान भी नहीं था | किशोर टकटकी लगाए उन बदलो को देख रहा था, जो उसके गाँव के ऊपर से हो कर जा रहे थे, ये बदल उसकी बेबसी को देख तो रहे थे लेकिन रो नहीं रहे थे | किशोर का दिल बैठा जा रहा था, उसे मालूम था अगर इस बार फिर फसल नहीं उगी तो जमीन का एक टुकड़ा अमरचंद तो देना होगा | चिलचिलाती धुप मे हर रोज वो खेत तक जाता और एक हारे हुए सिपाही के तरह वापस आता| लगभग १५ दिन हो चुके थे, अभी भी धुप उसके अरमानो को पिघला कर खत्म करने तो आमादा थी | आखिर सोल्वे दिन सुबह सुबह, वो बाहर सोया था तो उसने महसूस किया के उसकी चादर नम हो रही है, उसने आँखे खोली तो चारो तरफ बादल थे, उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, घर के बहार पड़े कपडे अंदर किये, दोनों बच्चे अंदर ही सो रहे थे, आज उसकी आखो मे एक अलग से ही चमक थी, निर्मल को वापस बुलाने का टाइम आ गया लगता था | सोचा उसको बुला कर शादी कर दूँगा उसकी | बारिस ने उसके बीजो के साथ उसके ख्वाबो के अंकुरो को भी फूटने पर विवश कर दिया था |

लगभग ३ महीने हो चुके थे | इस बार सब कुछ उम्मीद से ज्यादा ही अच्छा था | फसल कटने को ही थी के उसने सुना सरकार ने कुछ नोटबंदी का फैसला लिया है | उसने तो वैसे भी ५०० और १००० के नोट फसल बोने और बेचने के अलावा कभी देखे ही नहीं थे | ना उसके पास १०० रूपये से ज्यादा थे ना ही बैंक मे कुछ रकम जमा थी , उसको तो शायद ही इससे फर्क पड़ता था | उधर निर्मल के मालिक ने भी बोला के वो कुछ दिन के लिए आपने लड़को को कम कर रहा है क्योकि कोई उसकी दुकान पर आ ही नहीं रहा था |  निर्मल घर ही आ कर किशोर का हाथ बटा रहा था |  २० दिन बाद जब वो फसल ले कर मंडी पहुँचा तो कोई भी व्यापारी उसकी तरफ देख ही नहीं रहा था, एक ही झुटके में उसकी सारी मेहनत अछूत हो गई थी |  एक व्यापारी ने उससे बोला के वो उसकी फसल खरीद सकता है लेकिन दाम आधे ही देगा | २ दिन मंडी मे ही पड़े हो गये थे,  किशोर का दिल पूरी तरह से बैठ चूका था ऊपर से ब्याज भी बढ़ रहा  था | आखिर उसने अपनी सफेद फसल को काली के दाम बेच दि |

सब कुछ अमरचंद को देने के बाद लगभग ५० रूपये बचे  थे | दोनों भरी कदमो से घर आये, किशोर का मन रोने को कर रहा था | उसे समझ ही नहीं आ रहा था, कौन हारा कौन जीता, लेकिन उसकी तो हार ही हुई थी | अब उसमे फिर से लड़ने की हिम्मत ही नहीं बची थी, निर्मल अगले दिन फिर से मुम्बई चला गया, मालिक ने लगभग आधे पैसो मे उसे फिर से रख लिया, बोला धंधा ठीक होते ही फिर से तन्ख्हा पुराने जिंतनी कर देगा | किशोर का मन अब उठने को नहीं करता था, एक दिन वो अपने खेत मे बैलो के साथ बैठा था, बैलो को रस्सी से आजाद किया और रस्सी को पेड़ पर डाला, अब मन इस दुनिया से आजाद होने को कर रहा था, थोड़ी देर बाद उसका छोटा बेटा खेत पर पहुँचा, पर देर हो चुकी थी | जय जवान .... जय किसान मे से किसान मिट चूका था |

* ये एक काल्पनिक रचना है, कुछ घटनाओ का प्रयोग सिर्फ रचनातत्मकता के लिए किया गया है 


Monday, 26 December 2016

शादी एक अभिशाप वीणा भाग २

भाग एक से आगे.......
   
 थोड़ी देर बाद उसे होश  आया, उसके चहरे पर पानी के चंद बुँदे पडी थी, और माँ के हाथ मे पानी का गिलास था| वीणा ने एक दो घुट पानी पिया, उसकी चेतना अब वापस आ गई थीं|  माँ ने निश्ठुर भाव से उसकी तरफ देखा और फिर नीचे जाने का इशारा किया |वीणा ने ध्यान से देखा, वहाँ पर एक चाय की ट्रे थी| वीणा चाय लेकर नीचे गयी, दुष्यंत का पूरा परिवार वहाँ मौजूद था, साथ मे  उसकी एक हम उम्र लड़की भी थी| उसका ध्यान दुष्यन्त पर गया, वो एक पर अधेड़ उम्र का  इंसान था, उसकी उम्र के दुगने से भी ज्यादा| वीणा को उसकी नजरे अपने ऊपर चुभ रही थी, वो शायद वीणा को ऊपर से नीचे तक घूरे जा रहा था |  गिद्ध की नजर एक बेबस  चिड़िया पर पड़ चुकी थी, जो की कई महीनो से पिंजरे में कैद थी, और अब तो उसके पंख भी नोच दिए गए थे | वीणा  पिछले छह महीने के दर्द को सिर्फ इसी उम्मीद के साथ सहन कर रही थी के शायद भविष्य के गृभ मे उसके लिए थोड़ी  खुशिया  हो, लकिन ये उम्मीद भी उसे अब छिनती हुई लगी । उसकी आखो के सामने अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था,  एक जीवन जो मित्रों और उमंगो के अध्यायों से भरा हुआ था, अब वह एक यातनाओ और दुखो के पथ की ओर अग्रसर था |


  थोड़ी देर बाद दुष्यंत के साथ बैठी लड़की वीणा के पास आयी और उसने बताया की  उसका नाम ज्योति है, और वो दुष्यंत की सबसे छोटी बहन है,  साथ मे उसने  बताया की उसके परिवार ने वीणा को पसंद कर लिया है | अब वीणा की भावनाये बेकाबू हो रही थी, वीणा की आखो से आसुओ की एक अविरल धारा बह निकली, ज्योति को लगा ये शायद ख़ुशी के आंसू है उसने वीणा को आगे बढ़ कर गले सी लगा लिया |  ज्योति नीचे गयी और उसने सबको बताया के वीणा इस फैसले से खुश है, दुष्यंत की माँ ने अपने पर्स से एक सोने की चैन निकली और वीणा की  माँ की ओर बढाई, वीणा की माँ ने उसे सर से लगाया और दोनों हाथ जोड़ लिए | सभी लोगो ने एक दूसरे को रिश्ता पक्का होने की बधाई दी |  दुष्यंत की माँ ने बोला, वो लोग शादी जल्दी चाहते है, दुष्यंत शहर मे अकेला रहता है, और वो लोग चाहते है की वीणा वहाँ जा कर उसके साथ रहे | यहाँ पर एक अपराध हो रहा था लकिन कोई भी न तो अपराध बोध से घिरा था न ही कोई एक लड़की के दर्द को समझ पा रहा था, हर कोई माँ बाप के फैसले से इत्तफाक रखता था |


  वीणा का दिल अब विद्रोह करने के लिए उतावला हो गया, उसकी हालत उस कैदी जैसी थी जिसको उम्र कैद की सजा दे दी गयी हो, उसका दिल और दिमाग बस वहाँ से भाग जाने की उदेडबुन में ही लगा हुआ था | आखिर शादी से दो दिन पहले उसने भागने का मौका मिला,  रात के लगभग १२ बज चुके थे और वीणा की आँखों से नींद कोसो दूर थी, दिल की  हर धड़कन उसे प्रतिपल  महसूस हो रही थी, वो धीरे से अपनी खाट से उठी, ना उसने अपना बैग उठाया न ही कुछ लिया, शायद अभी अपने को बचाना ही सबसे बड़ा उदेश्ये  था| वीणा ने धीरे घर का दरवाजा खोला, घर मे कुछ रिश्तेदार सोये थॆ|  उनसे बचकर वो  बाहर निकली, लकिन शायद आज उसकी किस्मत उसके साथ नहीं थी, उसकी मौसी की आँख खुल गयी,  उसने किसी को घर से बाहर जाते हुए देखा, वो जोर चिल्लाई वीणा अब सर पर पैर रख कर भागी | थोड़ी ही देर मे, घर के सब लोग जाग चुके थे, उन्हें ये समझने मे ज्यादा समय नहीं लगा के चिडीया पिंजरा तोड़ के उड़ गई |


उन्होंने पूरी शिद्दत से वीणा को फिर से पकड़ लाने की कोशिश  शुरू की, मानो  वीणा को वापस लाना ही अब इन लोगो की  जिन्दकी का एकमेव उद्देश्य हो|  कोई भी ये सोचना ही नहीं चाहता था, की गलत क्या है और सही क्या,  उन्माद सोचने कि शक्ति को समाप्त कर देता है | शायद उसी उन्माद से अब  लोग वीणा को ढूढने मे लगे थे | एक लड़की  जिसे वो शायद अब तक बहन और बेटी के तरह देखते थे,  आज उसे  एक दुश्मन की तरह ढूढने निकले थे| किस्मत भी आज वीणा के साथ आँख मिचोली खेल रही थी, या फिर अभी उसके भाग्य  मे लिखे दुःख पुरे नहीं हुए थे,  वीणा को मोह्हले के चोकीदार ने रेलवे स्टेशन कि तरफ जाते हुए देख  लिया|  घर वालो को अब ये मालूम था के वीणा किस तरफ गई है, सभी लोग स्टेशन की तरफ भागने लगे |


वीणा स्टेशन पर पहुची, उसने देखा के वहाँ एक माल गाडी खड़ी  है, भाग कर उसके एक डिब्बे मे छुप गयी| | वीणा जिस डिब्बे मे बैठी थी, वो कपडे के बंडलों से भरा  था, वीणा एक खाली जगह देख कर उसमे जा छुपी, इंतजार करने लगी के कब ये मालगाड़ी स्टेशन सी रवाना हो | स्टेशन पर १० मिनट बाद कोलाहल सुरु हो गया, कुत्ते गंध सूंघ चुके थे , डब्बे से बहार का शोर स्पृष्ठ सुनाई दे रहा था , जिसमे से कई आवाजे उसकी जानी पहचानी थी, वो आवाजे  जो अब  कर्कश हो चुकी थी|  शायद प्रेम की भावना को निकाल कर उनमे नफरत के अंगारे भर दिए गये हो  | "वीणा बाहर आ  जा " यही चारो और पुकारा  जा रहा था, लेकिन उसे पता था  बहार आने की सजा, आज लगभग ६ महीने बाद किसी से डर भी नहीं था|  लकिन थोड़ी देर बाद डब्बे मे कुछ आवाज आने लगी,  अब उन लोगो ने एक एक डब्बे के तलाशी सुरु कर दी थीं | वीणा ने अपनी आँखे बंद  कर ली, लेकिन उससे  दुर्भाग्य तो नहीं बदलने  वाला था, अचानक उसने अपनी कलाइयों पर दबाव महसूस किया, सामने  मंजू मौसी का बड़ा लड़का खड़ा था | उसने बाकी लोगो को आवाज लगाई, "यहाँ छुपी है" | बस  वीणा का बुरा काल आ  गया  था, चारो तरफ से  चप्पल जूते और ना जाने किस किस चीज से उसे मारा जाने लगा | तभी उसके नाना ने कहा की कल  इसकी शादी है, इतना मत मारो | फिर उसे पकड़ कर घर लाया गया, घर पर आ कर उसे किसी ने  कुछ नहीं कहा , माँ ने उसे चाय ला कर दि, चाय थोड़ी  कड़वि  थीं, लेकिन वीणा मे अब प्रश्न करने की हिम्मत नहीं थी | उसने चाय पी और थोड़ी ही देर मे उसे उसकी पलके भारी होने लगी, थोड़ी ही देर मे वो अपने होश खो चुकी थी |




वीणा को अपना होश खोये हुए लगभग ३ दिन हो चुके थे, आज थोड़ा थोड़ा  होश वापस आ रहा था| उसने चारो तरफ देखा,  हर तरफ अनजान लोगो का जमावड़ा था, इनमे से वो किसी को भी नहीं पहचानती थी, सब औरते उसकी ओर धयान से देख रही थी, कुछ उसे पैसे भी दे रही थी| उसे कुछ कुछ पिंजरे मे बैठे जानवर जैसी अनुभूति हुई | थोड़ी देर मे उसने ज्योति को देखा, अब भी उसे कुछ कुछ समझ नहीं आया  | ज्योति ने हँसते हुए कहा चलो भाभी को थोड़ा तो होश आया, नहीं तो लग रहा था भाभी अभी तक रात के खुमार से बहार ही नहीं निकली है | वीणा को उसकी बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन उसका शरीर और आत्मा दोनों दर्द  से भरे हुए थे|  थोड़ी देर बाद  एक वर्द्ध औरत ने वीणा और ज्योति को कमरे मे जाने के लिए कहा , वीणा तो शायद बहुत देर से इसी का इंतजार कर रही थी | कमरे मे जाते ही उसने ज्योति को पुछा कि उसके साथ क्या हुआ है, तब ज्योति ने बताया के उसकी शादी  दुष्यंत  से हो चुकी है | वीणा के माँ ने बताया था की  शादी के पहले  वो गांव देवता के पूजा करते हुए गिर गयी और गांव के वैध जी ने दर्द कम करने के दवाई दी थीं, तभी से  वो  थोड़ा बेसुध थी, अब उसकी  समझ मे सारा  माजरा आ रहा था,  दूध पिलाने वाली माँ ने ही उसे बेसुध करने कि कोई जड़ी चाय मे पिलाई थी | चिड़िया अब एक न सिर्फ पिंजरे मे कैद थी, बल्कि वो पिंजरा भी उसके लिए पूरी तरह से नया था | आत्महत्या या फिर इस पुरे परिवार के हत्या वीणा का अंतर्मन, एक बड़े झूले के तरह कभी इधर कभी उधर गोते लगा रहा था |  किसी भी लड़की की  जिन्दकी के सबसे खुशगवार पल, उसके लिए शायद वो कड़वे पल थे जिन्हें वो जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं |

 To be continued.......

Friday, 23 December 2016

वीणा का गुनाह -- Begining


यह कहानी एक लड़की के बारे में  है, जिसमे कुछ भी असामान्य नहीं था , वह एक सामान्य स्कूली  लड़की थी । उसका नाम  था वीणा  । उसके पिता एक कंपनी में सुपरवाइजर थे और मां घर पर ही रहती थी । उसके स्कूल थोड़ा दूर था जिसकी वजह से वजह  से सामान्यतः वो बस से जाती थी  । उसका  नीले रंग का  बैग और डिजाइनर हेयर पिन, जो उसके पिताजी पटना से खरीदा  था, उसके ट्रेडमार्क था।


                   बस स्टॉप पर वो दिन भी एक सामान्य  दिन जैसा ही था,  वह अपने दोस्तों से बात कर रही  थी साथ मे , जाने या  अनजाने मे  वो एक अंजान  लड़के  की ओर भी देख रही थी | यह लड़का भी एक सामान्य लड़का ही  था इसकी कमर पर  एक स्कूल बैग था  और  कपडे थोड़े गंदे थे। लेकिन उसके चेहरे पर चमक कुछ प्रकार के थी , जो वीणा  को उसे अनदेखा करने की अनुमति नहीं दे रही थी । अगले दिन फिर वही लड़का उसी जगह पर मिला , दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा ओर मुस्कुराये , बस फिर  दोनों वापस अपने घर चले गए । एक  महीने हो गया था,  फिर भी दोनों मुस्कान के आगे नहीं  बढ़े थे । एक दिन  आवारा लड़कों के एक  समूह उन दोनों को देखा और वे फिर वो  छेड़खानी पर उतर आए|  उन लड़को ने वीणा को हाथ लगाना शुरू किया , वीणा पीछे हठ गयी | वीणा के लिए जो हो रहा था वो बहुत कुछ अलग भी नहीं था,  क्योंकि उसने  इस व्यवहार को उसके जीवन के हर  पल  मे  देखा था । लेकिन लड़के के लिए शायद ये कुछ नया था  उसने अपने उन लड़को को मना किया , लड़को को ये नागवार गुजरा, जरा सी  देर मे ये छोटी सी बात  हातापाई  मे बदल चुकी थी  |


           अब समूह काफी  हिंसक हो गया और लड़का गंभीर रूप से घायल हो चला था  | उन्होंने वीणा को भी नहीं छोड़ा, जितनी गाली वो दे सकते थी वीणा को दी । वीणा को ना तो ये समझ आया की उसे किस बात की गाली दे जा रही है, न ये ही के वो लोग किसकी मर्जी से वो सब कर रही है । अंत में जब उन्होंने  देखा की  लड़का बेहोश हो गया है  वे उसे छोड़ कई घर की तरफ भाग गयी  | वह पर खड़े  कुछ लोगों ने उन दोनों के  परिवारों को सूचित किया।



            अगले 4-5 दिनों के इन 2 लोगों के लिए बहुत ही बुरे थे|   वीणा के लगभग रोज ही उसके माँ - बाप द्वारा पिटाई की गई थी, क्योंकि उन्हें  लड़ाई के बारे में पता चल गया था  और वे उसे  कोस रहा थे | वीणा को उस सब के लिए प्रातरित किया जा रहा था जो उसने किये भी नहीं था | वीणा के चीखे लगभग रोज मोह्हले मे गूंजती थी|  मोह्हले वाले भी उसे उसके किये का परिणाम बता कर पल्ला छाड़ लेते थे|


     एक सप्ताह  बीत चूका था वीणा को ना तो बहार जाने के इजाजत थी | स्कूल तो अब उसके लिए शायद हमेशा के लिए बंद हो चूका था | हर कोई उसे इस तरह सी   देखता था  जैसे उसने ना जाने कोन सी भरी गुनाह किया हो । जो पडोसी हमेशा उससे बात करते रहते थे वो अब वीणा  के साथ एक मुस्कान साझा करने के लिए भी जिझक रहे थे। वीणा का चेहरा जहा कभी हमेशा एक मुस्कान होते थी अब मुरछाया सा हो गया था , उसके जीने के उमंग  भी  शायद कही खो गयी थी  | उसके चहरे पर जब भी किसी भाव को आने की इजाजत मिलती तो वो भाव भी आपस में लड़ ही रहे होते  थे, कुछ जीने के भाव कुछ विद्रोह के भाव | माँ बाप तो शायद उसको सबक सीखाने की कोशिश  मे इतने खो चुके थे के उनको ये समझ ही  नहीं आ रहा था के जिसको वो प्रताड़ित कर रहे है वो कोई ओर नहीं उनकी ही अपनी बेटी है | वीणा की सबसे पक्की सहेली सयानी ने एक बार चुपके से उससे बात करने के कोशिश की लकिन उसका परिणाम उसे मिलने मे ज्यादा देर नहीं लगी | अगले दिन उसके फटे होठ ओर कान पर लगी चोट इस बात के गवाही दे रहे थे के रात मे उसके साथ क्या हुआ |


दूसरी तरफ लड़के के जीवन भी एक उतना आसान नहीं  था, माता पिता उससे दिन रात पूछ रहे थे की उसने ऐसा  क्यों किया । हर कुछ  बुरा जो अब तक उसके साथ हुआ था उसके लिए अब वीणा को जिम्मेदार बनाया जा रहा था |  उसके माँ बाप ने, वीणा के माँ बाप से भी आ कर बात  की,  ओर उसको नियंत्रण मे रखने के बात कह कर वो लोग वहाँ से चले गए । दूसरी तरफ जिन लड़कों ने उसे पीटा था  | उनसे कोई भी सवाल नहीं कर रहा था के उन्हें क्यों  एक लड़की के साथ ऐसा क्यों किया । कमजोर को पीड़ित करने का रिवाज आज वीणा को पूरी तरह से समझ आ रहा था |



स्कूल में, घर मे  हर कोई  एक ही सवाल  उससे पूछ रहा था की वीणा को उसने कैसे पटाया, वो तो बहुत ही छुपा रुस्तम निकल , ये सब कब से चल रहा था, अकेले में वो लोग कितने बार मिल चुके है | कोई भी ये बात नहीं समझ पर रहा था के वो लोग एक  बच्चे के मन के साथ खेल रहे  है जो के सिर्फ  15 साल का लड़का है, जो इस बोझ लेने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं है । लकिन ना तो उसे स्कूल जाने से रोका गया ना ही लोगो के दिल मे उसके लिए कोई नफरत थे बल्कि उसके लिए कुछ इज्जत थी के उसने ऐसा काम किया जो वो करना तो चाहते थी लकिन नहीं कर पाए | एक ही घटना के दो विपरीत परिणाम दो अलग अलग लोग भुगत रहे थे|




वीना के विचार  हर पल बदल रहे थे  | कभी वो गम के अंधेरो  में  होती तो  कभी  उसका  मन एक घायल शेर के तरह दुनिया को सबक सीखने को करता | कभी उसके मन में उठ रहे प्रश्न का पहाड़ होता तो कभी कुछ छोटे सवाल अपने  माँ बाप के लिये होते तो कभी उस समाज के बेइंतहा नफरत होती जो उसे पता नहीं किस गुनाह के सजा दे रहा था |  कभी वो  और थोड़ा आक्रामक होती तो कभी पीछे हठ कर अपने को अपने आप में समेट लेती। उसका सवाल  माता-पिता के लिए काफी जायज था, के अगर वो मोहन के साथ भाग गयी होते तो क्या वो जायद खुश होते या फिर   उन लड़कों उसके साथ बलात्कार किया होता तो वो जायद निशिन्त होते । सामाजिक धागे में उलझा एक मन हर समय तर्क वितरक पर उतारू था। वो समाज को एक सबक सिखाने को भी आतुर था, लकिन रिस्तो के उन अनचाहे बंधनो ने उसे विवश कर दिया था | माँ जो के कभी वीणा को अपने आँचल में दबा के रखती थी वो अब उसे सबक सिखाने पैर उतारू थी | यह संग्राम अब  महिला बनाम  महिला हो चूका था | एक माँ अब वीणा को  एक दुश्मन की तरह  देख रही है। कई विकल्प उसके  मन  में आ रहे थे मार देने का विचार, शादी का विचार। एक बचपन उनके द्वारा कुचला  ही जा चूका था अब ये लोग वीणा के  जीवन के साथ खेलने के लिए और ज्यादा हिंसक होते जा रहे हैं। वीना को कभी कभी डर ​​लगता था , लेकिन वह जानता है कि यह समाज एक  महिला पर क्या प्रतिक्रिया करता है|



यह सामान्य दिन था | 14 वर्षीय वीना के लिए, उसके चाचा और चाची को कुछ समय के बाद उसके घर आ रहे थे । वे दोनों जमशेदपुर के पास एक कसबे मे रहते थे | वीणा भी अपने चहरे भाई बहनो को देख कर काफी खुश  थी | लगभग 4 महीने के बाद उसे कुछ दोस्तों के साथ मिला था । लेकिन बच्चो के  मन में एक झिझक को  स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था । वे लोग  हमेशा वीणा से  कुछ दुरी बनाये रखते थे । जब माता पिता को एक बार बहार गए तो उन लोगो ने बताया के चाचा चाची ने  वीना वीणा से  दूर रहने के लिए कहा है। वीना फिर से अपने पुराग्रहो में फास गयी  इसके  बावजूद के उसने कुछ भी गलत नहीं किया था वो अपने को अपने  माता पिता के लिए एक अभिशाप के रूप मानने लगी थी।  वीणा जा कर भगवान् की मूरत के सामने बैठ गयी लकिन शायद भगवान ने भी उस से मुह फेर लिए था | या फिर भगवान् के पास भी उसके सवालो के कोई जवाब नहीं था तो उन्होंने भी चुप रहना बेहतर समझा |

  माता-पिता  और चाचा चाची ने  वीणा  के बारे में बात करना किया । शायद भारत में हर समस्या के एक ही समाधान होता है  शादी | चाचा-चाची ने भी वीणा के लिए ये ही सुझाव रखा, उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले एक 30 साल का आदमी दुष्यंत के बारे मे भी बताया |  उन की नजरो मे वो  14 साल की लड़की वीना लिए  बिलकुल सही था । माता-पिता को इस विचार के लिए शायद थोड़ा तैयार नहीं थे। उनके विचार मे ये एक छोटी समस्या से निपटने का एक   जटिल मार्ग था । उनके लाल चेहरे और माथे पर पड़ी रेखाएं  अब एक दूसरे से लड़ रहे हैं। वे अपने  विचारों में वीना कई समय मार चुके थे, लेकिन अब यह  विचार न सिर्फ उसके पूर्णतः  मौत के था, बल्कि गिद्धों के तरह उसके  मृत शरीर को नोचने जैसा भी था । पहली बार डर लगा, लेकिन इसके लिए दुनिया में सबसे अच्छा अभ्यास है अपराध पर चर्चा करो और 2-3 दिनों के बाद  वही जग्नय अपराध अमल करने के लिए आसान हो जाएगा।

  दो दिन के बाद  दुष्यंत उसे देखने के लिए आया, वीणा को एक दुल्हन की तरह तैयार किया गया| वीणा अपने भविष्य से  पूरी तरह से वाकिफ थी । उसे अपने को तैयार करना अंदर ही अंदर खाये जा रहा था, उसे  लग रहा था इससे अच्छा होता के वो उसकी अर्थी सजा देते ।  वीणा ना चाहते हुए भी तैयार हुई और नीचे गयी | उसका मन और शरीर अब साथ नहीं दे रहा था वापस आ कर वो बिस्तर पर गिरी और बेहोश हो गयी |

  जारी  है............