भाग एक से आगे.......
थोड़ी देर बाद उसे होश आया, उसके चहरे पर पानी के चंद बुँदे पडी थी, और माँ के हाथ मे पानी का गिलास था| वीणा ने एक दो घुट पानी पिया, उसकी चेतना अब वापस आ गई थीं| माँ ने निश्ठुर भाव से उसकी तरफ देखा और फिर नीचे जाने का इशारा किया |वीणा ने ध्यान से देखा, वहाँ पर एक चाय की ट्रे थी| वीणा चाय लेकर नीचे गयी, दुष्यंत का पूरा परिवार वहाँ मौजूद था, साथ मे उसकी एक हम उम्र लड़की भी थी| उसका ध्यान दुष्यन्त पर गया, वो एक पर अधेड़ उम्र का इंसान था, उसकी उम्र के दुगने से भी ज्यादा| वीणा को उसकी नजरे अपने ऊपर चुभ रही थी, वो शायद वीणा को ऊपर से नीचे तक घूरे जा रहा था | गिद्ध की नजर एक बेबस चिड़िया पर पड़ चुकी थी, जो की कई महीनो से पिंजरे में कैद थी, और अब तो उसके पंख भी नोच दिए गए थे | वीणा पिछले छह महीने के दर्द को सिर्फ इसी उम्मीद के साथ सहन कर रही थी के शायद भविष्य के गृभ मे उसके लिए थोड़ी खुशिया हो, लकिन ये उम्मीद भी उसे अब छिनती हुई लगी । उसकी आखो के सामने अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था, एक जीवन जो मित्रों और उमंगो के अध्यायों से भरा हुआ था, अब वह एक यातनाओ और दुखो के पथ की ओर अग्रसर था |
थोड़ी देर बाद दुष्यंत के साथ बैठी लड़की वीणा के पास आयी और उसने बताया की उसका नाम ज्योति है, और वो दुष्यंत की सबसे छोटी बहन है, साथ मे उसने बताया की उसके परिवार ने वीणा को पसंद कर लिया है | अब वीणा की भावनाये बेकाबू हो रही थी, वीणा की आखो से आसुओ की एक अविरल धारा बह निकली, ज्योति को लगा ये शायद ख़ुशी के आंसू है उसने वीणा को आगे बढ़ कर गले सी लगा लिया | ज्योति नीचे गयी और उसने सबको बताया के वीणा इस फैसले से खुश है, दुष्यंत की माँ ने अपने पर्स से एक सोने की चैन निकली और वीणा की माँ की ओर बढाई, वीणा की माँ ने उसे सर से लगाया और दोनों हाथ जोड़ लिए | सभी लोगो ने एक दूसरे को रिश्ता पक्का होने की बधाई दी | दुष्यंत की माँ ने बोला, वो लोग शादी जल्दी चाहते है, दुष्यंत शहर मे अकेला रहता है, और वो लोग चाहते है की वीणा वहाँ जा कर उसके साथ रहे | यहाँ पर एक अपराध हो रहा था लकिन कोई भी न तो अपराध बोध से घिरा था न ही कोई एक लड़की के दर्द को समझ पा रहा था, हर कोई माँ बाप के फैसले से इत्तफाक रखता था |
वीणा का दिल अब विद्रोह करने के लिए उतावला हो गया, उसकी हालत उस कैदी जैसी थी जिसको उम्र कैद की सजा दे दी गयी हो, उसका दिल और दिमाग बस वहाँ से भाग जाने की उदेडबुन में ही लगा हुआ था | आखिर शादी से दो दिन पहले उसने भागने का मौका मिला, रात के लगभग १२ बज चुके थे और वीणा की आँखों से नींद कोसो दूर थी, दिल की हर धड़कन उसे प्रतिपल महसूस हो रही थी, वो धीरे से अपनी खाट से उठी, ना उसने अपना बैग उठाया न ही कुछ लिया, शायद अभी अपने को बचाना ही सबसे बड़ा उदेश्ये था| वीणा ने धीरे घर का दरवाजा खोला, घर मे कुछ रिश्तेदार सोये थॆ| उनसे बचकर वो बाहर निकली, लकिन शायद आज उसकी किस्मत उसके साथ नहीं थी, उसकी मौसी की आँख खुल गयी, उसने किसी को घर से बाहर जाते हुए देखा, वो जोर चिल्लाई वीणा अब सर पर पैर रख कर भागी | थोड़ी ही देर मे, घर के सब लोग जाग चुके थे, उन्हें ये समझने मे ज्यादा समय नहीं लगा के चिडीया पिंजरा तोड़ के उड़ गई |
उन्होंने पूरी शिद्दत से वीणा को फिर से पकड़ लाने की कोशिश शुरू की, मानो वीणा को वापस लाना ही अब इन लोगो की जिन्दकी का एकमेव उद्देश्य हो| कोई भी ये सोचना ही नहीं चाहता था, की गलत क्या है और सही क्या, उन्माद सोचने कि शक्ति को समाप्त कर देता है | शायद उसी उन्माद से अब लोग वीणा को ढूढने मे लगे थे | एक लड़की जिसे वो शायद अब तक बहन और बेटी के तरह देखते थे, आज उसे एक दुश्मन की तरह ढूढने निकले थे| किस्मत भी आज वीणा के साथ आँख मिचोली खेल रही थी, या फिर अभी उसके भाग्य मे लिखे दुःख पुरे नहीं हुए थे, वीणा को मोह्हले के चोकीदार ने रेलवे स्टेशन कि तरफ जाते हुए देख लिया| घर वालो को अब ये मालूम था के वीणा किस तरफ गई है, सभी लोग स्टेशन की तरफ भागने लगे |
वीणा स्टेशन पर पहुची, उसने देखा के वहाँ एक माल गाडी खड़ी है, भाग कर उसके एक डिब्बे मे छुप गयी| | वीणा जिस डिब्बे मे बैठी थी, वो कपडे के बंडलों से भरा था, वीणा एक खाली जगह देख कर उसमे जा छुपी, इंतजार करने लगी के कब ये मालगाड़ी स्टेशन सी रवाना हो | स्टेशन पर १० मिनट बाद कोलाहल सुरु हो गया, कुत्ते गंध सूंघ चुके थे , डब्बे से बहार का शोर स्पृष्ठ सुनाई दे रहा था , जिसमे से कई आवाजे उसकी जानी पहचानी थी, वो आवाजे जो अब कर्कश हो चुकी थी| शायद प्रेम की भावना को निकाल कर उनमे नफरत के अंगारे भर दिए गये हो | "वीणा बाहर आ जा " यही चारो और पुकारा जा रहा था, लेकिन उसे पता था बहार आने की सजा, आज लगभग ६ महीने बाद किसी से डर भी नहीं था| लकिन थोड़ी देर बाद डब्बे मे कुछ आवाज आने लगी, अब उन लोगो ने एक एक डब्बे के तलाशी सुरु कर दी थीं | वीणा ने अपनी आँखे बंद कर ली, लेकिन उससे दुर्भाग्य तो नहीं बदलने वाला था, अचानक उसने अपनी कलाइयों पर दबाव महसूस किया, सामने मंजू मौसी का बड़ा लड़का खड़ा था | उसने बाकी लोगो को आवाज लगाई, "यहाँ छुपी है" | बस वीणा का बुरा काल आ गया था, चारो तरफ से चप्पल जूते और ना जाने किस किस चीज से उसे मारा जाने लगा | तभी उसके नाना ने कहा की कल इसकी शादी है, इतना मत मारो | फिर उसे पकड़ कर घर लाया गया, घर पर आ कर उसे किसी ने कुछ नहीं कहा , माँ ने उसे चाय ला कर दि, चाय थोड़ी कड़वि थीं, लेकिन वीणा मे अब प्रश्न करने की हिम्मत नहीं थी | उसने चाय पी और थोड़ी ही देर मे उसे उसकी पलके भारी होने लगी, थोड़ी ही देर मे वो अपने होश खो चुकी थी |
वीणा को अपना होश खोये हुए लगभग ३ दिन हो चुके थे, आज थोड़ा थोड़ा होश वापस आ रहा था| उसने चारो तरफ देखा, हर तरफ अनजान लोगो का जमावड़ा था, इनमे से वो किसी को भी नहीं पहचानती थी, सब औरते उसकी ओर धयान से देख रही थी, कुछ उसे पैसे भी दे रही थी| उसे कुछ कुछ पिंजरे मे बैठे जानवर जैसी अनुभूति हुई | थोड़ी देर मे उसने ज्योति को देखा, अब भी उसे कुछ कुछ समझ नहीं आया | ज्योति ने हँसते हुए कहा चलो भाभी को थोड़ा तो होश आया, नहीं तो लग रहा था भाभी अभी तक रात के खुमार से बहार ही नहीं निकली है | वीणा को उसकी बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन उसका शरीर और आत्मा दोनों दर्द से भरे हुए थे| थोड़ी देर बाद एक वर्द्ध औरत ने वीणा और ज्योति को कमरे मे जाने के लिए कहा , वीणा तो शायद बहुत देर से इसी का इंतजार कर रही थी | कमरे मे जाते ही उसने ज्योति को पुछा कि उसके साथ क्या हुआ है, तब ज्योति ने बताया के उसकी शादी दुष्यंत से हो चुकी है | वीणा के माँ ने बताया था की शादी के पहले वो गांव देवता के पूजा करते हुए गिर गयी और गांव के वैध जी ने दर्द कम करने के दवाई दी थीं, तभी से वो थोड़ा बेसुध थी, अब उसकी समझ मे सारा माजरा आ रहा था, दूध पिलाने वाली माँ ने ही उसे बेसुध करने कि कोई जड़ी चाय मे पिलाई थी | चिड़िया अब एक न सिर्फ पिंजरे मे कैद थी, बल्कि वो पिंजरा भी उसके लिए पूरी तरह से नया था | आत्महत्या या फिर इस पुरे परिवार के हत्या वीणा का अंतर्मन, एक बड़े झूले के तरह कभी इधर कभी उधर गोते लगा रहा था | किसी भी लड़की की जिन्दकी के सबसे खुशगवार पल, उसके लिए शायद वो कड़वे पल थे जिन्हें वो जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं |
To be continued.......
थोड़ी देर बाद उसे होश आया, उसके चहरे पर पानी के चंद बुँदे पडी थी, और माँ के हाथ मे पानी का गिलास था| वीणा ने एक दो घुट पानी पिया, उसकी चेतना अब वापस आ गई थीं| माँ ने निश्ठुर भाव से उसकी तरफ देखा और फिर नीचे जाने का इशारा किया |वीणा ने ध्यान से देखा, वहाँ पर एक चाय की ट्रे थी| वीणा चाय लेकर नीचे गयी, दुष्यंत का पूरा परिवार वहाँ मौजूद था, साथ मे उसकी एक हम उम्र लड़की भी थी| उसका ध्यान दुष्यन्त पर गया, वो एक पर अधेड़ उम्र का इंसान था, उसकी उम्र के दुगने से भी ज्यादा| वीणा को उसकी नजरे अपने ऊपर चुभ रही थी, वो शायद वीणा को ऊपर से नीचे तक घूरे जा रहा था | गिद्ध की नजर एक बेबस चिड़िया पर पड़ चुकी थी, जो की कई महीनो से पिंजरे में कैद थी, और अब तो उसके पंख भी नोच दिए गए थे | वीणा पिछले छह महीने के दर्द को सिर्फ इसी उम्मीद के साथ सहन कर रही थी के शायद भविष्य के गृभ मे उसके लिए थोड़ी खुशिया हो, लकिन ये उम्मीद भी उसे अब छिनती हुई लगी । उसकी आखो के सामने अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था, एक जीवन जो मित्रों और उमंगो के अध्यायों से भरा हुआ था, अब वह एक यातनाओ और दुखो के पथ की ओर अग्रसर था |
थोड़ी देर बाद दुष्यंत के साथ बैठी लड़की वीणा के पास आयी और उसने बताया की उसका नाम ज्योति है, और वो दुष्यंत की सबसे छोटी बहन है, साथ मे उसने बताया की उसके परिवार ने वीणा को पसंद कर लिया है | अब वीणा की भावनाये बेकाबू हो रही थी, वीणा की आखो से आसुओ की एक अविरल धारा बह निकली, ज्योति को लगा ये शायद ख़ुशी के आंसू है उसने वीणा को आगे बढ़ कर गले सी लगा लिया | ज्योति नीचे गयी और उसने सबको बताया के वीणा इस फैसले से खुश है, दुष्यंत की माँ ने अपने पर्स से एक सोने की चैन निकली और वीणा की माँ की ओर बढाई, वीणा की माँ ने उसे सर से लगाया और दोनों हाथ जोड़ लिए | सभी लोगो ने एक दूसरे को रिश्ता पक्का होने की बधाई दी | दुष्यंत की माँ ने बोला, वो लोग शादी जल्दी चाहते है, दुष्यंत शहर मे अकेला रहता है, और वो लोग चाहते है की वीणा वहाँ जा कर उसके साथ रहे | यहाँ पर एक अपराध हो रहा था लकिन कोई भी न तो अपराध बोध से घिरा था न ही कोई एक लड़की के दर्द को समझ पा रहा था, हर कोई माँ बाप के फैसले से इत्तफाक रखता था |
वीणा का दिल अब विद्रोह करने के लिए उतावला हो गया, उसकी हालत उस कैदी जैसी थी जिसको उम्र कैद की सजा दे दी गयी हो, उसका दिल और दिमाग बस वहाँ से भाग जाने की उदेडबुन में ही लगा हुआ था | आखिर शादी से दो दिन पहले उसने भागने का मौका मिला, रात के लगभग १२ बज चुके थे और वीणा की आँखों से नींद कोसो दूर थी, दिल की हर धड़कन उसे प्रतिपल महसूस हो रही थी, वो धीरे से अपनी खाट से उठी, ना उसने अपना बैग उठाया न ही कुछ लिया, शायद अभी अपने को बचाना ही सबसे बड़ा उदेश्ये था| वीणा ने धीरे घर का दरवाजा खोला, घर मे कुछ रिश्तेदार सोये थॆ| उनसे बचकर वो बाहर निकली, लकिन शायद आज उसकी किस्मत उसके साथ नहीं थी, उसकी मौसी की आँख खुल गयी, उसने किसी को घर से बाहर जाते हुए देखा, वो जोर चिल्लाई वीणा अब सर पर पैर रख कर भागी | थोड़ी ही देर मे, घर के सब लोग जाग चुके थे, उन्हें ये समझने मे ज्यादा समय नहीं लगा के चिडीया पिंजरा तोड़ के उड़ गई |
उन्होंने पूरी शिद्दत से वीणा को फिर से पकड़ लाने की कोशिश शुरू की, मानो वीणा को वापस लाना ही अब इन लोगो की जिन्दकी का एकमेव उद्देश्य हो| कोई भी ये सोचना ही नहीं चाहता था, की गलत क्या है और सही क्या, उन्माद सोचने कि शक्ति को समाप्त कर देता है | शायद उसी उन्माद से अब लोग वीणा को ढूढने मे लगे थे | एक लड़की जिसे वो शायद अब तक बहन और बेटी के तरह देखते थे, आज उसे एक दुश्मन की तरह ढूढने निकले थे| किस्मत भी आज वीणा के साथ आँख मिचोली खेल रही थी, या फिर अभी उसके भाग्य मे लिखे दुःख पुरे नहीं हुए थे, वीणा को मोह्हले के चोकीदार ने रेलवे स्टेशन कि तरफ जाते हुए देख लिया| घर वालो को अब ये मालूम था के वीणा किस तरफ गई है, सभी लोग स्टेशन की तरफ भागने लगे |
वीणा स्टेशन पर पहुची, उसने देखा के वहाँ एक माल गाडी खड़ी है, भाग कर उसके एक डिब्बे मे छुप गयी| | वीणा जिस डिब्बे मे बैठी थी, वो कपडे के बंडलों से भरा था, वीणा एक खाली जगह देख कर उसमे जा छुपी, इंतजार करने लगी के कब ये मालगाड़ी स्टेशन सी रवाना हो | स्टेशन पर १० मिनट बाद कोलाहल सुरु हो गया, कुत्ते गंध सूंघ चुके थे , डब्बे से बहार का शोर स्पृष्ठ सुनाई दे रहा था , जिसमे से कई आवाजे उसकी जानी पहचानी थी, वो आवाजे जो अब कर्कश हो चुकी थी| शायद प्रेम की भावना को निकाल कर उनमे नफरत के अंगारे भर दिए गये हो | "वीणा बाहर आ जा " यही चारो और पुकारा जा रहा था, लेकिन उसे पता था बहार आने की सजा, आज लगभग ६ महीने बाद किसी से डर भी नहीं था| लकिन थोड़ी देर बाद डब्बे मे कुछ आवाज आने लगी, अब उन लोगो ने एक एक डब्बे के तलाशी सुरु कर दी थीं | वीणा ने अपनी आँखे बंद कर ली, लेकिन उससे दुर्भाग्य तो नहीं बदलने वाला था, अचानक उसने अपनी कलाइयों पर दबाव महसूस किया, सामने मंजू मौसी का बड़ा लड़का खड़ा था | उसने बाकी लोगो को आवाज लगाई, "यहाँ छुपी है" | बस वीणा का बुरा काल आ गया था, चारो तरफ से चप्पल जूते और ना जाने किस किस चीज से उसे मारा जाने लगा | तभी उसके नाना ने कहा की कल इसकी शादी है, इतना मत मारो | फिर उसे पकड़ कर घर लाया गया, घर पर आ कर उसे किसी ने कुछ नहीं कहा , माँ ने उसे चाय ला कर दि, चाय थोड़ी कड़वि थीं, लेकिन वीणा मे अब प्रश्न करने की हिम्मत नहीं थी | उसने चाय पी और थोड़ी ही देर मे उसे उसकी पलके भारी होने लगी, थोड़ी ही देर मे वो अपने होश खो चुकी थी |
वीणा को अपना होश खोये हुए लगभग ३ दिन हो चुके थे, आज थोड़ा थोड़ा होश वापस आ रहा था| उसने चारो तरफ देखा, हर तरफ अनजान लोगो का जमावड़ा था, इनमे से वो किसी को भी नहीं पहचानती थी, सब औरते उसकी ओर धयान से देख रही थी, कुछ उसे पैसे भी दे रही थी| उसे कुछ कुछ पिंजरे मे बैठे जानवर जैसी अनुभूति हुई | थोड़ी देर मे उसने ज्योति को देखा, अब भी उसे कुछ कुछ समझ नहीं आया | ज्योति ने हँसते हुए कहा चलो भाभी को थोड़ा तो होश आया, नहीं तो लग रहा था भाभी अभी तक रात के खुमार से बहार ही नहीं निकली है | वीणा को उसकी बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन उसका शरीर और आत्मा दोनों दर्द से भरे हुए थे| थोड़ी देर बाद एक वर्द्ध औरत ने वीणा और ज्योति को कमरे मे जाने के लिए कहा , वीणा तो शायद बहुत देर से इसी का इंतजार कर रही थी | कमरे मे जाते ही उसने ज्योति को पुछा कि उसके साथ क्या हुआ है, तब ज्योति ने बताया के उसकी शादी दुष्यंत से हो चुकी है | वीणा के माँ ने बताया था की शादी के पहले वो गांव देवता के पूजा करते हुए गिर गयी और गांव के वैध जी ने दर्द कम करने के दवाई दी थीं, तभी से वो थोड़ा बेसुध थी, अब उसकी समझ मे सारा माजरा आ रहा था, दूध पिलाने वाली माँ ने ही उसे बेसुध करने कि कोई जड़ी चाय मे पिलाई थी | चिड़िया अब एक न सिर्फ पिंजरे मे कैद थी, बल्कि वो पिंजरा भी उसके लिए पूरी तरह से नया था | आत्महत्या या फिर इस पुरे परिवार के हत्या वीणा का अंतर्मन, एक बड़े झूले के तरह कभी इधर कभी उधर गोते लगा रहा था | किसी भी लड़की की जिन्दकी के सबसे खुशगवार पल, उसके लिए शायद वो कड़वे पल थे जिन्हें वो जल्द से जल्द खत्म करना चाहती थीं |
To be continued.......
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