Sunday, 8 January 2017

विमुद्रीकरण


विमुद्रीकरण 


 राम किशोर मराठवाड़ा का एक छोटा सा किसान है जो अपने परिवार को जाने कैसे पाल रहा था उसे ही पता था | उसका गांव झाबेली औरंगाबाद से लगभग ६० कोस के लगभग होगा| सुख सुविधाओ का मामले में तो ये औरंगाबाद से लगभग ६०० साल पीछे है | इस गांव मे बिजली के खम्बे आये तो लगभग ५ साल हो चुके है , लकिन बिजली चुनावो का अलावा शायद ही कभी आती है | गांव का एकमात्र सम्बन्ध बाहरी दुनिया से बस है जो हफ्ते मे तीन दिन झाबेली तक आती है |  इस गांव मे ज्यादातर किसान पैसे के लिए गन्ने पर ही निर्भर है | लकिन न जाने भगवान इस जगह से क्यों नाराज था, तीन साल हो चुके थे लकिन इस गांव मे बारिस लगभग ना के बराबर ही पडी थी  | किशोर की माँ कई बार बोल चुकी थी  कि लगता है इस बार भगवान शायद कुछ ज्यादा ही नाराज हो गए है , ना जाने कोन  भूल हो गयी| पंडित जी के बताये रास्ते भी पिछले २ सालो मे इतनी बार फेल हो चुके थे के लगता था की भगवान न सिर्फ नाराज हुए है बल्कि मंदिर से भी चले गए है, पंडित जी अब शायद बे मन से ही आरती कर रहे थे, उन्हें भी शायद नहीं पता था आगे क्या होने वाला है | बस किसी तरह जिन्दकी चल रही थी, हर रोज खाने की  जद्दोजहद मे ही गुजर रही थी |

 किशोर का बड़ा बेटा निर्मल , तंग आ कर  मुम्बई चला गया था, खेती करने वाले उसके दोनों मजबूत हाथ आज लोगो की जूठन धोने को मजबूर थे| पर इस देश का दुर्भाग्य है, जय जवान जय किसान का नारा दे कर किसानों को सैनिको जैसा सम्मान तो दिया गया पर कभी भी उनके जीवन की  जद्दोजहद को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया| निर्मल जो दो बैलो के साथ अपने खॆत जोतते  जोतते बड़ा हुआ, आज जीवन ने उसे अपना बैल बना लिया| लकिन उसके काम की वजह से ही आज उसके घर मे चूल्हा जल  रहा था, उसके दोनों भाई जो पढ़ रहे थे, उनका ख़र्चा भी उसके ही जिम्मे था | मुम्बई जहाँ लोग अपने सपनो को जीने आते है वहाँ ये जीवन शायद अपने सपनो को मार कर दुसरो के जीवन कि भट्टी मे अपने जीवन का कोयला डाल रहा था | निर्मल को अपने घर के याद तो आती थी, लेकिन वो जानता था छुट्टी का मतलब, इस बैल को तो शायद बीमार रहने का भी अधिकार नहीं था | कभी कभी जीवन, की क्रूरता उसकी आखो को नम करती थी लेकिन वो फिर फिर अपनी शर्ट से आंसू पोछता और काम पर लग जाता|

किशोर का शरीर अभी थोड़ा थोड़ा साथ छोड़ने लगा था | पिछले २ सालो से वो उस जमीन को बो रहा था, जिसमे बीज और मेहनत तो जा रहे थे पर बारिस ना होने की वजह से कुछ बाहर  नहीं  आ रहा था | इस बार भी अगस्त आ चूका था, चारो तरफ बारिस हो रही थी, सिर्फ ये ही जमीन प्यासी थी, पंडित जी ने एक दिन गुस्से मे आ कर मंदिर का ताला लगा दिया, बस अब और नहीं इतने भी जुल्म मत करो भगवान, अब बस भी करो |

किशोर के लिए ये बुवाई का समय था, इस बार तो बीज के लिए पैसे भी नहीं थी, उसका मन हुआ निर्मल से बात करे,लेकिन दूसरे ही पल ख्याल आया, गूंगे बैल के कंधे पर इतना भी बोझ ना डाले के वो कन्धा ही टूट जाए | आखिर उसने बैंक जाने का मन बनाया, वो सुन रहा था किसानों को सरकार कम कीमत में  बीज उपलब्ध करा रही है | आज ना जाने वो कितने सालो बाद गांव से बाहर आया था, बस से उतर कर वो सीधा बैंक गया, शायद इतनी  साफ़ और चकाचोंध  से भरी कोई जगह उसने  सपने मे भी देखि हो | थोड़ी देर बाद उसका नंबर आया, बैंक मेनेजर के सामने वो हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया, मेनेजर ने उसकी और एक धिक्कारता भरी नजर डाली, शायद वो बोल गया था ये कहा से आया साला| उसका व्यव्हार शायद हमारे सामाज का ही दर्पण था | मेनेजर ने उसे कुछ फॉर्म भर के आने के लिए कहा, बोला सब कुछ होने के बाद लगभग २० से २५ दिनों मे उसका लोन पास हो जाएगा |

किशोर के पास उतना समय नहीं था, आखिर उसने फिर से मंडी का रुख किया, मंडी जो अब शायद गिद्धों के बस्ती थी, यहाँ पर पैसा मिलना आसान था लेकिन पीढ़िया बीत जाती थी उसी ख़तम करने मे, आखिर लाला अमरनाथ जी के यहाँ से उसे २ रूपये सैकड़ा पर लोन मिला | किशोर ने वापस से आकर आपने बूढ़े बैलो को हीकरा | फिर से एक आशा के साथ वो लोग बुवाई मे लग गए, आशा से बड़ा कुछ नहीं, एक किसान ही है जो लाख मुसीबत उठा कर भी फिर से धरती माता को अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार हो जाता है |

२ दिन बीत चुके थे, बारिस का कोई नामो निशान भी नहीं था | किशोर टकटकी लगाए उन बदलो को देख रहा था, जो उसके गाँव के ऊपर से हो कर जा रहे थे, ये बदल उसकी बेबसी को देख तो रहे थे लेकिन रो नहीं रहे थे | किशोर का दिल बैठा जा रहा था, उसे मालूम था अगर इस बार फिर फसल नहीं उगी तो जमीन का एक टुकड़ा अमरचंद तो देना होगा | चिलचिलाती धुप मे हर रोज वो खेत तक जाता और एक हारे हुए सिपाही के तरह वापस आता| लगभग १५ दिन हो चुके थे, अभी भी धुप उसके अरमानो को पिघला कर खत्म करने तो आमादा थी | आखिर सोल्वे दिन सुबह सुबह, वो बाहर सोया था तो उसने महसूस किया के उसकी चादर नम हो रही है, उसने आँखे खोली तो चारो तरफ बादल थे, उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, घर के बहार पड़े कपडे अंदर किये, दोनों बच्चे अंदर ही सो रहे थे, आज उसकी आखो मे एक अलग से ही चमक थी, निर्मल को वापस बुलाने का टाइम आ गया लगता था | सोचा उसको बुला कर शादी कर दूँगा उसकी | बारिस ने उसके बीजो के साथ उसके ख्वाबो के अंकुरो को भी फूटने पर विवश कर दिया था |

लगभग ३ महीने हो चुके थे | इस बार सब कुछ उम्मीद से ज्यादा ही अच्छा था | फसल कटने को ही थी के उसने सुना सरकार ने कुछ नोटबंदी का फैसला लिया है | उसने तो वैसे भी ५०० और १००० के नोट फसल बोने और बेचने के अलावा कभी देखे ही नहीं थे | ना उसके पास १०० रूपये से ज्यादा थे ना ही बैंक मे कुछ रकम जमा थी , उसको तो शायद ही इससे फर्क पड़ता था | उधर निर्मल के मालिक ने भी बोला के वो कुछ दिन के लिए आपने लड़को को कम कर रहा है क्योकि कोई उसकी दुकान पर आ ही नहीं रहा था |  निर्मल घर ही आ कर किशोर का हाथ बटा रहा था |  २० दिन बाद जब वो फसल ले कर मंडी पहुँचा तो कोई भी व्यापारी उसकी तरफ देख ही नहीं रहा था, एक ही झुटके में उसकी सारी मेहनत अछूत हो गई थी |  एक व्यापारी ने उससे बोला के वो उसकी फसल खरीद सकता है लेकिन दाम आधे ही देगा | २ दिन मंडी मे ही पड़े हो गये थे,  किशोर का दिल पूरी तरह से बैठ चूका था ऊपर से ब्याज भी बढ़ रहा  था | आखिर उसने अपनी सफेद फसल को काली के दाम बेच दि |

सब कुछ अमरचंद को देने के बाद लगभग ५० रूपये बचे  थे | दोनों भरी कदमो से घर आये, किशोर का मन रोने को कर रहा था | उसे समझ ही नहीं आ रहा था, कौन हारा कौन जीता, लेकिन उसकी तो हार ही हुई थी | अब उसमे फिर से लड़ने की हिम्मत ही नहीं बची थी, निर्मल अगले दिन फिर से मुम्बई चला गया, मालिक ने लगभग आधे पैसो मे उसे फिर से रख लिया, बोला धंधा ठीक होते ही फिर से तन्ख्हा पुराने जिंतनी कर देगा | किशोर का मन अब उठने को नहीं करता था, एक दिन वो अपने खेत मे बैलो के साथ बैठा था, बैलो को रस्सी से आजाद किया और रस्सी को पेड़ पर डाला, अब मन इस दुनिया से आजाद होने को कर रहा था, थोड़ी देर बाद उसका छोटा बेटा खेत पर पहुँचा, पर देर हो चुकी थी | जय जवान .... जय किसान मे से किसान मिट चूका था |

* ये एक काल्पनिक रचना है, कुछ घटनाओ का प्रयोग सिर्फ रचनातत्मकता के लिए किया गया है 


No comments:

Post a Comment