एक कदम भविष्य की ओर
वीणा के अगले दो हफ्ते शायद नरक से भी बदतर थे | वो उस हर यातना से हो कर गुजरी जिसके बारे ही सोच कर रूह तक काँप उठती है | दुष्यंत की माँ को भी शायद अभी कुछ भनक लग चुकी थी की वीणा के माँ बाप ने उसकी शादी इतनी जल्दी मे क्यों की थी | अब तो वीणा पर यातनाओ की बाढ़ आ गयी . हर एक दिन शायद वीणा की सहन शंक्ति की पराकाष्ठा का इम्तहान ले रहा था | वीणा एक अरमानो की लाश से ज्यादा कुछ भी नहीं थी | हर रोज उसकी आत्मा और शरीर वो सब झेल रहा था , जिसकी इजाजत ना तो इस देश का कानून देता है ना ही मानवता . वीणा को अभी दुष्यं एक कुत्ते से जायद कुछ नजर नहीं आता था जो रोज उस लाश से कुछ मॉस नोच कर चला जाता था जिसका शिकार किये उसे अरसा हो चूका था | ना अभी उसकी भावनाओ और ना ही उसकी चीखो को कोई सुनने वाला था . वीणा रात मे जब भी रोती थी ज्योति उसके पास कर उसका गम हल्का करने के कोशिस करती थी| वीणा के दिल से उठने वाली हर रुलाई शायद अभी उस घर से बहार नहीं जा रही थी | काश भगवान होता और शायद वो अपनी बनाई हर चीज़ का ख्याल रखता तो आज एक बचपन इस तरह ना रौंदा जा रहा होता, लकिन जब माँ - बाप ही दुश्मन हो जाए तो पारयो से क्या शिकायत करना. वीणा के तो अपने माँ बाप ने उसके यहाँ भेजा था | वो तो अपने रोने के कारण के लिए भगवान से मौत भी नहीं मांग सकती थे | जो भी हो वो उसके अपने माँ बाप ही थे, उन्होंने भले ही वीणा को अपने दिल में मार डाला हो वीणा ने उन्हें अभी भी दिल में जगह दी हुई थी.|
आज लगभग १५ दिन हो चुके थे | वीणा ने इस दुःख का अंत करने का निर्णय लिया और अपने कुछ कपडे और जेवर समेटे, साथ मे एक ब्लेड भी लिया जो उसने दुष्यंत के दाढ़ी बनाने के बॉक्स से चुराया था, निर्णय बहुत साफ़ था,इस बार अगर पकड़ी गयी तो मौत तो गले लगाना ज्यादा अच्छा था | उवो मौत शायद उसकी आज की जिन्दकी से ज्यादा आसान थी | वीणा को पता था गाँव से कुछ दूर पे एक बस स्टॉप है,और आखरी बस १० बजे आती थी | वो घर से लगभग ९ बजे निकली और उसके दिल के धड़कन बहुत तेजी से चल रही थी सास फूल रही थी, लकिन वो नही रुकी नहीं, इस अँधेरे रास्ते के पार उसका कुछ सुखद भविष्य हो सकता था | वो पसीने से लथपथ थी लकिन कैद से आजाद होने की ख़ुशी के आगे ना तो कोई थकान थी ना ही रुकने का कोई कारण | लगभग १५ मिनट बाद वो बस स्टॉप पर पहुची उसने अपने दुप्पटे को अपने सर और चहरे पर डाल लिया | वैसे तो उसके यहाँ पर कोई नहीं पहचानता था लकिन एक लड़की आज बंधन तोड़ के बहार निकल जाना चाहती थी | हर एक पल जो बस के इंतजार मे काट रहा था वो एक एक साल के बराबर था | तभी वह पर कुछ लोग आये वीणा की धड़कन अब बढ़ती जा रही थी वो हर चहरे मे अपने कैद देख रही थी |
कुछ देर बाद बस आई, वीणा ने एक चैन की सास ली, शायद उसके दुखो का ये आखरी पल था | वो बस मे बैठी बस चलने को ही थी के किसी ने बस तो रुकने के लियॆ कहा, वीणा को लगा शायद वो पकड़ी गयी | उसने दुपट्टे मे से झांक कर पीछे देखा, एक अधेड़ उम्र का जोड़ा पीछे से आ रहा था | महिला को शायद चलने मे कुछ परेसानी थे जिसके कारण वो लोग धीरे धीरे आ रही थे | वीणा ने चैन के एक सास ली और अपने सामान को अपनी गोद मे दबा कर बैठ गयी | बस ने अब कुछ रफ़्तार पकड़ ली थी, बस का परिचालक उसके पास आया और टिकेट लेने के लिए कहा | वीणा असमंजस मे पड़ गयी उसने तो ये सोचा ही नहीं था के जाना कहा है |
वीणा का दिमाक लगभग सुन्न पड़ चूका था | उसको कुछ भी सूझ नहीं रहा था, तभी पीछे से आवाज आई "ये हमारे साथ है " | परिचालक पीछे चला गया, वीणा ने पीछे मुड़ कर देखा, अभी अभी जो जोड़ा बस मे चढ़ा था उन्होंने उसका टिकेट ले लिया था | लगभग 3 घंटे के बाद बस अपने आखरी पड़ाव पर पहुची, बस ध्रीरे धीरे खाली होने लगी, रात के लगभग १ बज चुके थे | वो जोड़ा वीणा के पास आया शायद उन्होंने वीणा की परेशानी को थोड़ा तो समझ लिया था | उन्होंने वीणा को अपना परिचय दिया, महिला ने अपना नाम आशा और अपने साथ वाले पुरुष का नाम राठौर बताया, उन्होंने उससे पुछा के अभी उसके पास जाने के लिए कोई आसरा है | वीणा ने सर ना मे हिलाया, न जाने क्यों वो इन दोनों से अजीब से बंधन मासूस कर रही थी |
आशा और राठौर उसे अपने घर ले आये| उन्होंने पहले उससे उसकी पूरी कहानी पूछी, अब वो समझ चुके थी के वीणा एक भारी मुसीबत का सामने कर चुकी थी, उन्होंने उसे बताया के वो उसे ले कर पुलिस मे जा सकते है, वीणा लकिन अभी भी काफी डरी हुई थी, वीणा ने जाने के लिए इंकार कर दिया, दूसरा वो अब उस जीवन मे वापस नहीं जाना चाहती थी | आशा और राठौर असमंजस मे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था के वो क्या करे | उनकी नजरो मे ये एक पुलिस का मामला था, लकिन ऐसे मामलो मे पुलिस क्या करती है उन्हें पूरा मालूम था, आखिर उन्होंने अपने बेटे से बात कि, उसने उन्हें सलाह दे के वो उसे चैन्नई मे उसके दोस्त कि संस्था के पास भेज दे | वीणा को लेकर २ दिन बाद वो चैन्नई पहुचे |
आज वीणा को कुछ भी डर नहीं लग रहा था, जानिब इसके के वो बिलकुल अनजान लोगो के साथ थी | इस संस्था मे उसकी मुलाकात अपने जैसी कई लड़कियों से हुई, दुःख भी अजीब है, अगर एक तरह का हो तो लोग दोस्त जल्दी बन जाते है | वीणा ने पढ़ाई फिर से सुरु कर दी और अभी वो एक सुखद भविष्य की और चल चुकी थी |
No comments:
Post a Comment